समय का लेखा

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9th April, 2019, Edited by Focus24 team

फीचर्स डेस्क। खूबसूरत नक्काशीदार गमले में उगा गेंदे का पौधा हवा में लहलहा रहा था।  अचानक हवा के तेज झोंके के साथ वह बाहर की ओर झुक गया। वह चौंक पड़ा, बाहर नाली के किनारे पर उसके ही जैसा एक और गेंदे का पौधा लहलहा रहा था। "अरे ! तुम तो बिलकुल मेरी तरह दिखते हो ! लेकिन यहाँ, इस नाली में... !" कहकर वह उसे ऊपर से नीचे तक देखने लगा।

नाली के किनारे पर उगा गेंदे का पौधा मुस्कुराया और बोला, "आखिर हम हैं तो भाई-भाई। "

"भाई-भाई ! ऊँह ! कहाँ मैं इस गमले में पला-बढ़ा और तुम ।  मुँह देखा है अपना इस नाली के पानी में?" कहते हुए उसने अपना मुँह बिचकाया।

"अच्छा ! जरा याद करो, जिस दिन तुम गमले में बोये जा रहे थे, उस दिन मैं भी तो तुम्हारे साथ ही था।  वो तो हवा का तेज झोंका आया और मुझे अपने साथ उड़ाकर यहाँ नाली में गिरा गया।  तब से यहीं पल-बढ़ रहा हूँ। "

"हा हा, लो अब देख लो, एक तुम्हारी किस्मत और एक मेरी किस्मत। मैं यहाँ रंगबिरंगे फूलों वाले पौधों के बीच ठाठ से रहता हूँ।  और तुम, ऊँह ! नाली की दुर्गन्ध में...। " नाक चढ़ाते हुए वह बोला।

"दुर्गन्ध ! अच्छा मुझे तो पता ही नहीं, मैं तो अपनी ही सुगंध में खोया रहता हूँ।  वैसे ये बात तुम न समझ सकोगे। "

"अब मन बहलाने को कुछ भी कह लो।  जरा उस जमादार को देखो, सड़क पर झाड़ू लगाते-लगाते, अगर उसकी झाड़ू का एक भी पटका पड़ गया न तुम पर, तो सीधे इसी नाली में जा गिरोगे।  ही ही ही।

"हाँS, समय का लेखा भला कौन जानता है । । ।  "

तभी ऊपर छत से आवाज आई, "माली काका, तुमने अभी तक इस गेंदे के पौधे को गमले से हटाया नहीं ! कहा था न कि इसकी जगह गुलाब लाकर लगा देना।  "

"अरे मालिक, अभी लीजिये। " उसने उसे पकड़ा और उखाड़ कर तेजी से बाहर की ओर फेंक दिया। वह सीधे नाली में उसी गेंदे के पौधे के पास जा गिरा। अधमुंदी पलकों से वह कभी खुद को देखता कभी नाली के पानी को।

कंटेंट सोर्स : प्रेरणा गुप्ता, कानपुर सिटी।