साहस और शौर्य से भरे व्यक्तित्व के धनी थे छत्रपति शिवा जी

Slider 1
« »
20th May, 2019, Edited by Abhishek seth

नई दिल्ली। भारत वर्ष में एक से बढ़कर एक महान शूरवीरों की गाथाएं लोगों द्वारा कही जाती हैं। किसी ने लोगों के दिलों में छाप छोड़ी तो किसी ने इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज करा लिया। पूना में जन्मे हिन्दू मराठी देशभक्त शिवाजी ने अपने अनोखे कारनामों से इतिहास के पन्नों के साथ ही लोगों के दिलों में घर बना लिया था। शिवाजी का व्यक्तित्व दृढनिश्चयी, महान देशभक्त, धर्मात्मा, राष्ट्र निर्माता तथा कुशल प्रशासक का था। कुछ लोगों को इनमे परशुराम की छवि दिखती थी। इनकी छवि कुछ ऐसी ही थी कि जो भी इनसे एक बार मिलता था, बिना प्रभावित हुए नहीं रह पाता था।

आइये जानते हैं इनके जीवन के कुछ महान कार्य

जन्म-

साहस एवं शौर्य के लिए प्रसिद्द जीजाबाई के पुत्र शिवाजी का जन्म 19 फरवरी, 1630 को पूना के शिवनेरी दुर्ग में हुआ था। हालांकि इनके जन्म के विषय में विद्वानों ने विभिन्न तरह के मत दिए हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार इनकी जन्मतिथि 20 अप्रैल 1627 है।

आदर्श पुत्र-

शिवाजी वीर होते हुए भी एक आदर्श पुत्र के रूप में उभरकर सामने आए। माता के प्रति उनकी श्रद्धा एवं आज्ञाकारिता ही उन्हें एक आदर्श पुत्र के रूप में स्थापित करती है। तभी तो आज भी लोग इन्हें याद करते हुए जीजाबाई का पुत्र ही कहते हैं।

शिक्षा-दीक्षा

तीव्र बौद्धिक क्षमता के धनी शिवाजी की शिक्षा-दीक्षा मां के संरक्षण में ही हुई। इनकी मां अत्यंत धार्मिक प्रवृत्ति की थीं। अतः उसका असर इनपर भी गहरा पड़ा। शिवाजी की प्रतिभा को निखारने में दादाजी कोंणदेव का भी विषेश योगदान था। उन्होने शिवाजी को सैनिक एवं प्रशासकीय दोनो प्रकार की शिक्षा दी थी। शिवाजी में उच्चकोटी की हिन्दुत्व की भावना उत्पन्न करने का श्रेय माता जीजाबाई को एवं दादा कोंणदेव को जाता है।

वैवाहिक जीवन

शिवाजी बचपन से ही बड़े वीर योद्धा रहे। वीरता इनकी नसों में कूट-कूट कर भरी रही थी। इसलिए इनका दाम्पत्य जीवन कुछ खास नहीं रहा। इन्होने विवाह केवल अपने वंश को आगे बढ़ाने के लिए किया था। इनका विवाह 14 मई 1640 ई० में सइबाई निम्बालकर के साथ लाल महल पूना में हुआ था।

गौ एवं ब्राह्मणों की रक्षा करना जीवन का उद्देश्य

शिवाजी बचपन से ही तीक्ष्ण बुद्धि के थे। वे तात्कालिक सामाजिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक परिस्थितियों के प्रति बहुत सजग थे। इन्होने हिन्दु धर्म, गौ एवं ब्राह्मणों की रक्षा करना अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया था। इसी के साथ ही वे हिन्दुओं पर अत्याचार करने वाले मुगलों के विरोधी भी थे।

रायगढ़ बना मराठा राज्य की राजधानी

शिवाजी हिन्दु धर्म के रक्षक के रूप में मैदान में उतरे और मुग़ल शासकों  के विरुद्ध उन्होने युद्ध की घोषणां कर दी। वे मुग़ल शासकों के अत्याचारों से अच्छी तरह परिचित थे । इसलिए इन्होने मुगलों की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया था। उन्होंने मावल प्रदेश के युवकों में देशप्रेम की भावना का संचार कर कुशल तथा वीर सैनिकों का एक दल बनाया। शिवाजी ने अपने वीर तथा देशभक्त सैनिकों के सहयोग से जावली, रोहिङा, जुन्नार, कोंकण, कल्याणीं आदि अनेक प्रदेशों पर अधिकार स्थापित किया। प्रतापगढ तथा रायगढ दुर्ग जीतने के बाद उन्होने रायगढ को मराठा राज्य की राजधानी बनाया । शिवाजी पर महाराष्ट्र के लोकप्रिय संत रामदास एवं तुकाराम का भी प्रभाव था। संत रामदास शिवाजी के आध्यात्मिक गुरु थे, उन्होने ही शिवाजी को देश-प्रेम और देशोध्दार के लिये प्रेरित किया था।

अफजल खां को दिया धोखे का जवाब

शिवाजी की बढती शक्ती बीजापुर के लिये चिन्ता का विषय प्रतीत हो रही थी। इसलिए आदिलशाह की विधवा बेगम ने अफजल खां को शिवाजी के विरुद्ध युद्ध के लिये भेजा। परिस्थितियां विषम होने के कारण दोनों मैदान में समक्ष आकर युद्ध नहीं कर सकते थे। इसलिए दोनों पक्षों ने समझौता करना उचित समझा। 10 नवम्बर 1659 को अफजल खां ने शिवाजी से गले मिलते समय उनपर वार कर दिया। शिवाजी को उसकी इस मंशा पर पहले से ही शक था, इसलिए वे पूरी तैयारी से गए थे। शिवाजी ने अपना बगनखा अफजल खां के पेट में घुसेड़ दिया और बीजापुर पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। इस विजय के उपलक्ष्य में शिवाजी ने प्रतापगढ़ में भवानी मां के एक मंदिर का निर्माण कराया।

गोरिल्ला रणनीति भी है प्रसिद्द

शिवाजी एक कुशल योद्धा थे। उनकी सैन्य प्रतिभा ने मुग़ल शासक औरंगजेब को भी विचलित कर दिया था। शिवाजी की गोरिल्ला रणनीति को लोग छापामार रणनीति के नाम से भी जानते हैं। अफजल खां की हत्या, शाइस्ता खां पर सफल हमला और औरंगजेब जैसे चीते की मांद से भाग आना, उनकी इसी प्रतिभा और विलक्षण बुद्धी का परिचायक है।

सफल कूटनीतिज्ञ

शिवाजी एक सफल कूटनीतिज्ञ भी थे। इसी विषेशता के बल पर उन्होंने अपने शत्रुओं को कभी एक नहीं होने दिया। औरंगजेब से उनकी मुलाकात आगरा में हुई थी जहाँ उन्हें और उनके पुत्र को गिरफ्तार कर लिया गया था। परन्तु शिवाजी अपनी कुशाग्र बुद्धी के बल पर फलों की टोकरियों में छुपकर भाग निकले थे। मुगल-मराठा सम्बन्धों में यह एक प्रभावशाली घटना थी।

राष्ट्रध्वज से जुड़ा किस्सा

छत्रपति शिवाजी के राष्ट्र का ध्वज केशरिया है। इस रंग से संबन्धित एक किस्सा है। एक बार शिवाजी के गुरू, समर्थ गुरू रामदास भिक्षा मांग रहे थे, तभी शिवाजी ने उन्हे देखा उनको बहुत खराब लगा। शिवाजी, गुरु के चरणों में बैठ कर आग्रह करने लगे कि आप ये समस्त राज्य ले लें परन्तु भिक्षा न मांगे। शिवाजी की इस गुरु भक्ति को देखकर रामदास अत्यंत प्रसन्न हुए। वे शिवाजी को समझाते हुए बोले कि मैं राष्ट्र के बंधन में नही बंध सकता किन्तु तुम्हारे आग्रह को स्वीकार करता हुँ। मैं तुम्हे ये आदेश देता हुँ कि आज से मेरा ये राज्य तुम कुशलता पूर्वक संचालित करो। ऐसा कहते हुए समर्थ गुरु रामदास अपने दुप्पट्टे का एक टुकङा फाड़ कर शिवाजी को दिये तथा बोले कि मेरे वस्त्र का ये टुकङा सदैव मेरे प्रतीक के रूप में तुम्हारे साथ तुम्हारे राष्ट्र ध्वज के रूप में रहेगा जो तुम्हे मेरे पास होने का बोध कराता रहेगा।

अंतिम समय रहा बड़ा कष्टदायी

कुशल एवं वीर शासक छत्रपति शिवाजी का अंतिम समय बड़े कष्ट एवं मानसिक वेदना में व्यतीत हुआ। घरेलू उलझने एवं समस्यायें उनके दुःख का कारण रहीं। बड़े पुत्र सम्भाजी के व्यवहार से वे अत्यधिक चिन्तित थे। तेज ज्वर के प्रकोप से 3 अप्रैल 1680 को शिवाजी का स्वर्गवास हो गया।

शिवाजी केवल मराठा राष्ट्र के निर्माता ही नही थे, अपितु मध्ययुग के सर्वश्रेष्ठ मौलिक प्रतिभा-सम्पन्न व्यक्ति थे। महाराष्ट्र की विभिन्न जातियों के संघर्ष को समाप्त कर उनको एक सूत्र में बाँधने का श्रेय शिवाजी को ही है। इतिहास में शिवाजी का नाम, हिन्दु रक्षक के रूप में सदैव सभी के मानस पटल पर विद्यमान रहेगा। भारतीय इतिहासकारों के शब्दों के साथ कलम को विराम देते हैं।

“भारतीय इतिहास के रंगमंच पर शिवाजी का अभिनय केवल एक कुशल सेनानायक एवं विजेता का न था, अपितु वह एक उच्च श्रेणीं के शासक भी थे।“   - डॉ० रमेश चन्द्र मजुमदार। 

“शिवाजी भारत के अन्तिम हिन्दु राष्ट्र निर्माता थे, जिन्होने हिन्दुओं के मस्तक को एक बार पुनः उठाया।“   - सर जदुनाथ सरकार।