मेरे पापा हर एग्जाम में खुद स्कूटर चला के मुझे ले जाते थे…

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16th June, 2019, Edited by Shivangi Agarwal

फीचर्स डेस्क। मां, अगर किसी बच्चे के जीवन की पहली पाठशाला है तो पिता पाठशाला के प्रधानाचार्य हैं। उनकी समूची जिंदगी का एक ही मकसद होता है बच्चे को इंसान बनाना। कभी बोल कर तो, कभी बिना बोले वो अपनी संतान को कोई न कोई शिक्षा देते हैं। उजमा आसिया रहमान है, जिनका शादी के बाद टाइटल बदल कर उजमा अहमद हो गया। इनकी उम्र 41 है, इन्होनें 2009 में शादी किया। शादी के एक साल बाद मेरी बेटी फातमा पैदा हुई, उसे मेरे पापा बहुत ज़्यादा प्यार करते थे, कहते हैं ना मूल से ज़्यादा सुद प्यारा होता है, पर वह दो साल की भी नहीं थी मेरे पापा हम सबको को छोड़ के चल बसे। 

उजमा अपने पापा के बारें में बताते हुए कहा- मेरे पापा का नाम मोहमद नजीबुर रहमान था, वो सिविल इंजिनियर थे। मैंने जबसे होश संभाला तब से उन्हें बीमार देखा, उन्हें गेठिया था, जिसके वजह से उन्हें पैरों में बहुत तकीफ़ रहती थी। लेकिन फिर भी मैंने कभी उन्हें नमाज़ या और कोई काम छोड़ते नहीं देखा। चाहे जितनी भी तकलीफ रहती वह अपना घर का सारा काम करते थे। पैरों में तकलीफ की वजह से स्कूटर चलाना बहुत मुश्किल था फिर भी मेरे पापा हर एग्जाम में खुद स्कूटर चला के मुझे ले जाते थे। वह बहुत हिम्मत वाले इंसान थे। मैं अपने घर में सबसे छोटी हूं, मेरे 3 भाई हैं, अपने छोटे भैया से भी 11 साल छोटी, दीदी 15 साल मुझसे बड़ी, इसलिए दीदी कि शादी हो गई थी, सभी भाई पढ़ने र नौकरी से बाहर थे।

इसलिए मैं अपने घर में सबसे लाडली थी, पर अम्मी और पापा दोनों बीमार रहने की वजह कर बहुत कम उम्र से घर संभालना पड़ा। मैं क्लास 8 से पूरा घर संभाल रही थी, इस लिए मेरी शादी के बाद मेरे अम्मी पापा बहुत अकेले पड़ गए थे, शादी के 2 महीने बाद ही मुझे पता चला कि मेरे पापा को किदनी की बीमारी है।

सुनते ही मैं ससुराल से उन्हें देखने आयी थी, मैं उनकी बहुत खिदमत करती थी, शादी के बाद कोई देखने वाला नहीं रहा, इस लिए उनकी तबियत दिन-ब-दिन खराब होती गई और शादी के दो साल बाद ही उनकी तबीयत बहुत खराब हो गई। मै पटना आई हुई थी, जिस दिन मुझे जाना था उसी दिन मेरे पापा बहुत सीरियस हो गए और पता चला उनका दोनों किडनी फेल हो गया है, मै पटना में ही रुक गई उनका देख भाल करने। 8 महीना वह बेड पे रहे, मुझसे जितना हो सका मैंने उनकी खिदमत की। बस 7 महीने बाद में एक महीने के लिए अपने हसबैंड के पास अरुणाचल गई थी, उनका ट्रांसफर हुआ था तो घर सेट करने, तब मेरे पापा का डायलिसिस हुआ था तो वह थोड़ा ठीक थे। पर मेरे जाते ही उनकी तबीयत फिर बहुत खराब हो गई और वह सिर्फ मुझे याद करते थे, हर काम के लिए वह मुझे ही पुकारते थे, एक दिन अम्मी ने बोला उजमा है नहीं, चली गई है, पर मेरे पापा ने बोला उजमा रहे ना रहे पुकारना तो उजमा को ही है । । । ये सुनके सबकी आंखें भर आई थी। उनकी तबीयत बिगड़ी गई बस सांसें चल रही थी जैसे किसी का इंतजार हो और जैसे ही मैं आती उनकी रूह निकाल गई और वह हमेशा के लिए हमें छोड़ के चले गए। जैसे सबके पापा उनके सुपरहीरो होते हैं मेरे भी थे, और उनके जाने के बाद मेरी दुनिया बदल गई। मुझे ऐसा सदमा लगा था कि मैं मेंटली डिस्टर्ब हो गई थी। बहुत दिनों बाद मैं ठीक हुई। आज तक मैं उन्हें मिस करती हूं र हमेशा करती रहूंगी।

जाते जाते वो अपने जाने का गम दे गये। । ।

सब बहारें ले गये रोने का मौसम दे गये। । ।

ढूंढती है निंगाह पर अब वो कही नहीं। । ।

अपने होने का वो मुझे कैसा भ्रम दे गये। । ।

मुझे मेरे पापा की सूरत याद आती है। । ।

वो तो ना रहे अपनी यादों का सितम दे गये। 

एक अजीब सा सन्नाटा है आज कल मेरे घर में।

घर की दरो दिवार को उदासी पेहाम दे गये। 

बदल गयी है अब तासीर, तासीरी जिन्दगी की। 

तुम क्या गये आंखो में मन्जरे मातम दे गये।  Miss U Papa

नोट : यह प्रतियोगिता एमएमसी ग्रुप और फोकस 24 न्यूज़ के सयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया।