पार्ट 01 : स्मित हास्य से तुम...!!

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24th January, 2019, Edited by Focus24 team

फीचर्स डेस्क। अच्छा लगता है जब आप किसी हताश व्यक्ति को मोटीवेट करते हो तो खुद जब आप किसी विषम परिस्थितियों से गुजरते है तो आसान हो  जाता है  समझना  और समझाना, परिस्थितियों से लड़े हारे नही संघर्ष करे   कमजोर ना बने,आत्मविश्वास लाएं, दो पल की जिंदगी हौसला रखे और खुश रहे...!

तुम्हारी क्या राय है बताओ ज़रा। तुम तो नीड़ रक्षक और पालन करता हो। मनुष्यों के भी और पंछियों के भी।  हताश पंछी जब थक हार तुम्हारे पास आते है तो उन्हें कितना सुकूँ कितना मिलता होगा की कम से कम उनके घरौंदे महफ़ूज़ तुम्हारी  छत्र छाया में।और एक इंसान जब तुम्हारी छाँव में बैठता है तो तुम्हारी घनेरी ठंडी हवा में कितना आराम मिलता होगा। कल्पना मात्र से दिल खुश हो जाता है।

काश यह सुकूँ इंसान एक दूसरे को दे पाता। विडंबना यही है की अपनी  जब वह खुद खुश होता है तो ओरों को खुश करता है। और जब वह दुखी तो खुश रहने वाला इंसान उसको दुश्मन लगने लगता है। वजह आज तक समझ नही पाई। बेशक़ हम सामाजिक प्राणी है पर,जिस लक्ष्य  के ख़ातिर हम समाज को अपनाते है उसका निर्माण करते है वह कहीं न कहीं अधूरा लगता है। मायूस हो जाती है मनःस्थिति। यह सच है की इंसान है तो उसपर हर परिस्थिति हावी होती है। कभी कभी एक इंसान इतना त्रस्त हो जाता है की वह जिंदगी से बेज़ार और मायूस हो जाता है। समस्या सुलझाने या समझने की बज़ाय वह तरह तरह के   तर्क और वितरकों में फंस जाता है। नतीज़ा मायुसी, हताशा न सलाह देने वाले और उलाहना करने वाले बहुत मिल जाते है। पर सामंजस्य के साथ समझाने वाले बहुत कम।

यहाँ पर दो बाते होती है  या तो वह खुद समाधान निकालकर मुक्त हो जाएँ और आगे बढ़ें। दूसरी बात वह किसी सी कुछ नही कहता अंदर ही अंदर घुटता  है और छुपाने लगता है यह स्थिति भयावह होती है। जिसमे उसका सबसे ज्यादा नुकसान  होता है और निश्चिंत तौर पर अधिकतर अपना अंत भी।  खैर, कहते है इंसान और रिश्तें एक दूसरे के पूरक होते है पर यह मिथ्या तब साबित होते है जब वे एक दूसरे का साथ नही देते। द्वेष, अहम और उलहाना के बिच अपनत्व को तरसता इंसान जिंदगी से  मुक्त  हो जाता है। यह जानते हुए भी की यह अमूल्य ज़िन्दगी सिर्फ एक बार मिलनी है आहिर वह अपनी हो या किसी और की....!!

तो क्यों न हम आप झूठा ही सही एक दूसरे को दिलासा देते रहे ताकि इस झूठी सहानुभूति और स्नेह में हम एक अनमोल ज़िन्दगी अधूरी नही बल्कि पूरी जी सकें।मेरे नम्र आग्रह  करने से भी क्या होगा। कुछ लोग पढ़ लेंगे और भुल जाएंगे। तो कुछ मुस्कुराकर नज़रंदाज़ कर देंगे। पर पहल तो सच्ची वाली तो खुद से करनी  पड़ेंगी न।  इतनी भीड़ भाड़ वाली दुनियाँ में हम मनुहार करे भी तो किस से। शायद ज़िन्दगी जीने के लिए खुद् से बड़ा साथी कोई और नही क्योंकि जिंदगी खुद को जीनी है तो यक़ीनन हमें सबको जीने भी देना होगा।

जानती हूँ इसे पढ़ने के बाद ज्यादा से ज्यादा उम्दा ,बेहतरीन,बहुत खुब कहकर मुझे भी टाल दिया जाएगा। टिप्पणी नही चाहिए पढ़कर प्रतिक्रिया दे तो बेहतर।

 हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी, फिर भी तन्हाईयों से परेशां आदमी

यह गीत शायद सटीक बैठता है। अंत में बस इतना ही की  एक पल ही सही खुश होकर जी लीजिए न...।!!

क्रमशः “स्वरा” सुरेखा अग्रवाल, लखनऊ सिटी।