उनकी दिक्कत शासक पक्ष नहीं,भाजपा की प्रबलता है 

Slider 1
Slider 1
Slider 1
Slider 1
« »
11th August, 2019, Edited by manish shukla

रामेश्वर मिश्र पंकज
कांग्रेस और उसके समर्थन में 70 वर्षों तक राष्ट्रीय संसाधनों का आनुपातिक दृष्टि से भेदभाव पूर्ण लाभ उठाने वाले और योग्यता से अधिक प्रतिष्ठा पाने वाले लेखकों और कलाकारों तथा अन्य बौद्धिकों ने एक बयान जारी किया है कि सशक्त विपक्ष नहीं होने से भारतीय लोकतंत्र ठीक से काम नहीं कर रहा है। वस्तुत: इन बयानवीरों को पता ही नहीं है कि समय बदल गया है, और उनकी असलियत भारत के शिक्षित और प्रबुद्ध समाज के सामने निरंतर उघड़ती जा रही है : लोगों से प्रेम तथा अच्छे संस्कारित आचरण का समर्थक होने का जो नकाब उन्होंने पहन या ओढ़ रखा था, वह धीरे-धीरे उनके चेहरे से लगभग पूरी तरह सरक चुका है, और सामने जो उनकी असलियत दिख रही है, वह वीभत्स और डरावनी है । भगवान की कृपा है कि वैसे डरावने कार्य ये लोग पूरी शक्ति से कर सकने की स्थिति में नहीं हैं। यद्यपि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो शक्तियां भारत विरोधी हैं, उनके साथ इन बौद्धिकों का सक्रिय और गुप्त, दोनों तरह का सहयोग है, जो भारत के लिए चिंताजनक है। विश्व की न्यायप्रिय भारत प्रेमी शक्तियां और व्यक्ति भी इस से चिंतित हैं।

सबसे पहले इस बात पर विचार किया जाए कि सशक्त विपक्ष के नहीं होने से लोकतंत्र में शासन पक्ष मनमानी करता है। यह बयान कितना सार्थक होता, यदि उस समय भी दिया जाता, जब भारत में अनेक चुनावों के नाम मात्र का विपक्ष रहा और कांग्रेस का ही सर्वाधिकार 50 से अधिक वर्षों तक रहा। भारत की संसद में यह स्थिति रही है, और 1947 से 1967 के 20 वर्षों तक तो पूरी तरह कांग्रेस का ही संसद में लगभग एकाधिकार रहा है। उस समय इन बयानवीरों में से एक ने भी अथवा उनके पूर्ववत्र्ती उनकी धारा के किसी भी बड़े बौद्धिक ने भी कभी ऐसा कोई बयान नहीं दिया था। इससे यह सच्चाई सामने आती है कि शासक पक्ष का प्रचंड होना और विपक्ष का अत्यंत निर्बल होना और कमजोर होना और उसका अस्तित्व मात्र शेष रहना इनके लिए कभी कोई समस्या नहीं थी। इनकी समस्या है कि वहां इनकी परम प्रिय पार्टी के स्थान पर वह पार्टी क्यों है, जिसके अस्तित्व से ही इनको घृणा है, और जिसे ये अपने लिए अजनबी पाते हैं। भले ही संपूर्ण देश उस पार्टी को अपनी मान रहा हो और आत्मीयता दे रहा हो पर इन्हें वह पार्टी अजनबी और विरोधी नजर आती है। इसलिए इन्हें परेशानी शासक पक्ष की प्रबलता से नहीं है, केवल भाजपा शासन की प्रबलता से है, यह बात स्पष्ट हो जाती है।

इनका मिशन फेल
अब उन बातों पर विचार किया जाए जिनकी ये बौद्धिक लोग चर्चा करते हैं। हम पाते हैं कि बौद्धिक बनने वाले ये लोग वस्तुत: एकांगी और असंतुलित हैं। भारत के विशाल जन गण से इन्हें गहरा विद्वेष और परायापन है। ये उसे बदलना चाहते हैं। पहले ये आत्मविश्वास में थे कि किसी तरह यहां के बहुसंख्यकों को कुचल डालेंगे और शेष बचे लोगों को धीरे-धीरे रूपांतरित कर लेंगे, अपने में ढालेंगे, उन्हें भौतिकतावादी तथा धर्म से घृणा करने वाला और नेताओं को ही महान विचारक आदि कहने वाला तथा नेताओं के प्रिय लेखकों और कलाकारों को महान बौद्धिक मानने वाला दास समाज बना डालेंगे। परंतु वह तो संभव नहीं हो सका, लेकिन 'सोशल ट्रांसफॉरमेशन" का इनका मिशन फेल होने के बावजूद या फेल होने के कारण ही हिंदू समाज से इन्हें एक गहरी घृणा और विद्वेष हो गया है, और इन्होंने विश्व में जो भी हिंदू धर्म और हिंदू समाज की विरोधी शक्ति हैं, उनसे गहरी आत्मीयता के रिश्ते बनाए हैं, और उनके संकेत पर काम करते हैं। यह बहुत स्पष्ट रूप से शिक्षा और संचार माध्यमों में उनके क्रियाकलाप को देखकर हम जान सकते हैं। वैसे अगर ध्यान से देखा जाए तो ये भाजपा के सच्चे सेवक हैं क्योंकि भाजपा जो काम बिल्कुल नहीं कर रही है, और जिससे कि उसे कभी भी सत्ता से बेदखल होने का पूरा डर है, यह अपने शोर-शराबे से ऐसा आभास देते हैं कि भाजपा ठीक वही काम कर रही है।

सभी जानते हैं कि भाजपा ने हिंदू धर्म और हिंदू समाज के पक्ष में एक भी कदम आज तक नहीं उठाया है। समाजवादी झुकाव वाले कांग्रेसी धड़े के शासन में कम्युनिस्ट शासनों की नकल में धर्म के विरु द्ध बड़ी चतुराई और जटिलता तथा सूक्ष्मता से कार्य किया जाता रहा है, और सनातन धर्म को, हिंदू धर्म को निर्बल और कमजोर करते हुए क्रमश: उसे नष्ट कर डालने की योजना पर काम किया जाता रहा है जिसके सैकड़ों प्रमाण हैं। सर्वविदित है कि भाजपा के जो निरे चाटुकार लोग हैं, उन्होंने हवा बनाई कि भाजपा हिंदुत्व की पार्टी है परंतु अपने आचरण से तो भाजपा आज तक हिंदुओं के साथ हुए अन्याय को दूर करने के लिए भी आवश्यक कदम नहीं उठा सकी है। जो अन्याय समाजवादी और कम्युनिस्ट धारणा से बंधे हुए कांग्रेसियों के शासन में हिंदू समाज के विरु द्ध निरंतर किया गया, उसे सुधारने का कोई कदम भाजपा ने नहीं उठाया है।

इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण उदाहरण है कि मूल संविधान की आत्मा को नष्ट करते हुए विभिन्न प्रशासनिक उपायों द्वारा और एकांगी आग्रह द्वारा केवल अल्पसंख्यकों के संरक्षण वाली धारा का शोर कांग्रेस शासन में मचाया गया और यह भुला ही दिया गया कि वस्तुत: अल्पसंख्यकों को यह संरक्षण और सुविधा हिंदुओं के नेताओं ने ही संविधान सभा में की थी है परंतु कांग्रेस के नेतृत्व में कुछ ऐसा किया गया कि ऐसे उदार और दाता हिंदू समाज को भिखारी बनने की स्थिति में डाल दिया गया: उसे गौ रक्षा के लिए, राम मंदिर के लिए, भगवान राम कृष्ण की कथा तथा वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, गीता शासकीय विद्यालयों में पढ़ाने के लिए शासन से भीख मांगने कि स्थिति में डाल दिया गया। इस प्रकार कांग्रेस ने तो दाता को भिखारी बना दिया और पार्टियां जो स्वयं वोटों की भिखारी हैं, वे भारत की स्वामी बन गर्इं। भाजपा भी लगभग उसी तर्ज पर चल रही है,और शासन में आते ही अपने को कम्युनिस्ट शासन की तरह स्वामी ही कई बार मानती दिखती है। परंतु ये बौद्धिक लोग तो हिंदुत्व की आहट तक से इतना डरते हैंं कि भाजपा सरकार पर ऐसे आरोप लगाते हैं जो उसने कभी किए ही नहीं आज तक और अभी तक लोगों की निरंतर मांग के बावजूद।

हिंदू समाज का सोशल ट्रांसफॉरमेशन
इस प्रकार एक अर्थ में तो ये बौद्धिक लोग भाजपा की सेवा करते हैं परंतु इनका मूल लक्ष्य हिंदू समाज का सोशल ट्रांसफॉरमेशन है : उसे नास्तिक, भौतिकतावादी, धर्म विरोधी और नीतिविहीन तथा हर तरह के कामाचार और अनीति को उत्सव की तरह मानने वाले बदहाल समाज में रूपांतरित करना है, इसके लिए विशेषकर सिनेमा, रंगमंच और साहित्य सहित महत्त्वपूर्ण कला माध्यमों में ये प्रयास किए गए। परंतु हिंदू समाज का इतिहास इतना विराट है, और संस्कार इतने गहरे हैं कि हिंदू धर्म के विरु द्ध समस्त भेदभावपूर्ण अनुचित और अनीतिमय शैक्षणिक और संचारात्मक कदमों के बावजूद सरकार हिंदुओं को पूरी तरह नास्तिक और धर्मद्रोही तथा सनातन धर्म के प्रति आस्था से रहित नहीं बना पाई है। अत: भाजपा में हिंदुत्व की थोड़ी सी रंगत देखते ही ये बौद्धिक लोग घबरा जाते हैं जबकि शासन मे आई भाजपा का परिदृश्य यह है कि उन कानूनों और प्रस्तावों को जो 70 वर्षों में स्वयं कांग्रेस ने बारम्बार लाने की कोशिश की और विफल रही, उन्हें ही तो भाजपा ला रही है।
सबसे पहले तीन तलाक बिल को उदाहरण के रूप में लेते हैं। तीन तलाक बिल से हिंदुओं को क्या लेना देना? मुस्लिम पर्सनल लॉ तो यथावत है, और हिंदू लॉ को तो भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 15 तथा 19 और 25 के अंतर्गत विवेचना कर उसके कई प्रावधान रद्द कर दिए हैं, क्योंकि उसके लिए प्रमाण हिंदू लॉ नहीं हैं, संविधान की धाराएं ही हैं,यह समझ में आता है। हिंदू तो यह चाहेंगे कि या तो मुस्लिम पर्सनल लॉ, ईसाई पर्सनल लॉ आदि सब समाप्त हों और यदि ऐसा नहीं होता तो हिंदुओं के भी विवाह आदि के मामले में, परिवार की व्यवस्था, उत्तराधिकार आदि के मामले में शासन तटस्थ और निरपेक्ष रहे, वह केवल इतनी सजगता बरतें कि कोई लैंगिक असमानता न हो, कोई भेदभावमूलक व्यवहार न हो परंतु इन प्रतिबंध योग्य बातों के अतिरिक्त फिर किसी रूप विशेष से शासन को कोई मतलब नहीं होना चाहिए। सच तो यह है कि धर्म शास्त्रों में हिंदुओं के लिए जो नियम हैं, उनको 1947 के बाद रद्द और अस्वीकार कर दिया गया है, और संविधान को ही नया धर्मशास्त्र मान लिया गया है जबकि मुसलमानों के लिए कुरान और हदीस धर्म शास्त्र हैं तथा ईसाइयों के लिए बाइबल धर्मशास्त्र है, और उन सबको विशेष संरक्षण है। मनुष्य मात्र को एक मानना सभी हिंदू धर्म शास्त्रों का सार है, और उसमें हिंदू और गैर-हिंदू जैसा कोई विभाजन ही नहीं है, और इसलिए किसी समाज को अन्य समाज मानने की कोई धार्मिक भावना हिंदुओं के धर्म शास्त्र में है ही नहीं।

इसलिए हिंदू को तो केवल यह चाहिए कि सभी के साथ एक सा व्यवहार हो। अगर 12 करोड़ या 15 करोड़ लोगों को उनके धार्मिक ग्रंथों के आधार पर शादी-ब्याह, परिवार और अन्य रीति-रिवाज को करने का सहज अवसर दिया जाता है, तो 110 करोड़ लोगों को भी वही अवसर मिलना चाहिए परंतु भाजपा ने तो उस दिशा में कभी कोई बयान नहीं दिया और विचार तक नहीं व्यक्त किया। ऐसी स्थिति में तीन तलाक का जो बिल है, वह तो मुसलमानों का आंतरिक मामला है, और हिंदुओं की इसमें कोई भी रु चि नहीं है। इसलिए तीन तलाक बिल पास होता है, या नहीं होता है, यह या भारतीय जनता पार्टी जाने और अन्य पार्टियां जानें। उसका हिंदू समाज से कोई संबंध नहीं है, और उसे हिंदू समाज के प्रति भाजपा का झुकाव प्रचारित करना झूठ बोलते हुए भ्रम रचने का तरीका है। जहां तक सुरक्षा संबंधी विधेयकों की बात है, कांग्रेस ने कम से कम संसद में कभी भी राष्ट्रीय सुरक्षा को गौण विषय नहीं बताया। इसलिए सुरक्षा के पक्ष में और आतंकवाद के विरोध में जो भी विधेयक भाजपा सरकार ला रही है, वह कांग्रेस पार्टी की निरंतरता में ही है, और अपने को बौद्धिक कहने वाले लोग आतंकवाद के समर्थन में परोक्ष रूप से जिस प्रकार सक्रिय हो गए हैं, उस पर भाजपा शासन कार्रवाई क्यों नहीं करता? उन्हें राजद्रोह और देशद्रोह के कानूनों के अंतर्गत गिरफ्तार क्यों नहीं करता? हिंदू समाज की मुख्य चिंता तो यही है।

लेखक 
रामेश्वर मिश्र पंकज
वरिष्ठ लेखक एवं चिंतक