जिस वृक्ष के लिए कृष्ण ने की लड़ाई, आज वह हुआ धरासायी

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18th February, 2017 - 10:11 PM, Edited by

वाराणसी सिटी। सिटी के कैन्टोमेंट एरिया के भीष्म चण्डी मन्दिर के पास स्थित 500वर्ष पुराना कल्प वृक्ष शुक्रवार को तेज़ हवाओं के चलने से अचानक धरासायी हो गया। इसके गिर जाने से स्थानीय निवासी अत्यंत दुखी हैं। इस वृक्ष का नाम ही कल्प वृक्ष था क्यों कि आदिकाल से ही इस वृक्ष के लिए देवताओं में लड़ाईयां होती रही हैं।

आइये जानते हैं इसकी पूरी कहानी-

पदम् पुराण के अनुसार, यह वृक्ष देवताओं एवं असुरों के संयोजन एक बाद समुद्र मंथन से निकला था। समुद्र मंथन के बाद देवता चाहते थे कि यह स्वर्ग में रहे लेकिन उसी समय भगवान विष्णु आकर उसे अपने लोक में लेकर चले गए। कहा जाता है कि कल्प वृक्ष विष्णु लोक ले जाते समय उसके कुछ बेज धरती पर ही गिर गए थे। जिसके सन्दर्भ में देवी देवताओ से उस समय मन्थन चलने लगा तो देवी देवताओ ने कहा, ‘जो बीज पृथ्वी पर गिरे हैं, यह बीज फिर किसी काल में इसी जगह पर आ जाएंगे’। इस वृक्ष की मान्यता बताते हुए देवी देवताओं ने उस समय कहा था कि जो भी व्यक्ति इस मनोकांमना रूपी वृक्ष के नीचे खड़े होकर सच्चे दिल से मांगेगा, उसकी मनोकामना अवश्य पूरी होगी।

केवल चार जगहों पर है मौजूद

मनोकामना पूर्ति के लिए इस वृक्ष के चारों तरफ लोग धागा भी बांधते हैं। जिससे कि उनकी मनोकामनाएं जल्द पूरी हों। आपको बता दें कि यह वृक्ष पुरे भारत में केवल चार जगहों पर मौजूद है। पहला बारांबकी, दो उत्तरांचल में एवं एक उत्तर प्रदेश के वाराणसी में, जो आज अचानक से गिरकर समाप्त हो गया।

कुछ वर्षों पूर्व हुई थी इसकी जांच

इस वृक्ष की जांच कुछ वर्षो पूर्व पर्यटन विभाग एवं बीएचयू के बॉटनी विभाग द्वारा की गई थी। उस मस्य इस पर दवा का छिडकाव करके समय रहते ठीक किया गया था। लेकिन इसके बाद कीटनाशक का छिड़काव न होने से यह समाप्त हो गया।

कपल्स के लिए फेवरेट था यह प्लेस

भीष्म चण्डी मन्दिर के समीप कल्प वृक्ष के पास प्रतिदिन काशी में रहने वाले यूथ एवं प्रेम में पिरोये प्रेमी जोड़े और विदेशो से आने वाले टूरिस्ट भी इस बृक्ष के पास जाकर अपनी सेल्फ़ी लेने से नहीं कतराते थे। लेकिन फारेस्ट डिपार्टमेंट की भारी लापरवाही के चलते समय समय पर कीटनाशक दवाओ के छिड़काव न होने के कारण यह सैकड़ो वर्ष पुराना यह मनोकामना कल्प वृक्ष समाप्त हो चला।

देवी-देवताओं का था वरदान

विषम चण्डी मन्दिर के महंत मंगला प्रसाद चौबे के अनुसार, यह मंदिर देवी-देवताओं के वरदान पर आधारित था। यहां पर बहुत दूर दूर से लोग अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए आते थे। जो भी भक्त इस वृक्ष के निचे खड़े होकर भगवान से कुछ भी मांगता था, भगवान उसकी मुराद अवश्य ही पूरी करते थे।

वृक्ष के लिए इंद्र और कृष्ण में छिड़ गया था युद्ध

आपको बता दें कि द्वापर में एक बार इसी वृक्ष के लिए इंद्र और भगवान कृष्ण में भी युद्ध छिड़ गया था। कृष्ण की पत्नी सत्यभामा को यह वृक्ष इतना पसंद आ गया था कि वह उसे अपने घर द्वारिका में स्थापित करना चाहती थीं। इसी कारण भगवान और देवताओं के राजा इंद्रा में भयंकर युद्ध हुआ था। परन्तु कृष्ण प्रकृति के नियमों के अनुसार, उस वृक्ष को स्वर्ग से ले जाने में विफल रहे।