अधूरापन

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18th April, 2019, Edited by Focus24 team

फीचर्स डेस्क। देवसखी के  सुंदर और पवित्र संबोधन के साथ साथ वह तमाम खत वह तमाम पँक्तियाँ मैन बखूबी महसूस की औऱ आत्मसात भी रहेगी सदियो तक

अब न मिलन की चाह औऱ न ही गुफ़्तगू की आरज़ू

सुनो पर वह  तुम्हारा  गंभीर मज़ाक बेहद अच्छा था। और मैं पगली उसे अमर प्रेम मान बैठी। पर शुक्रिया न यह सच भी की तुम्हारा मज़ाक ही सही उस प्रेम को मैं जी भर जी ली। अब इससे ज़्यादा की चाह भी नही। शुक्रिया इतना अनमोल उपहार देने के लिए। मैं खामखाँ तुमको कंजूस कहती रही पर आज अहसास हो रहा है कि मैं बहुत गलत थी। देखो न कितनी चाय उधार है तुम पर मेरी। वह झप्पी के साथ मुलाकात भी अधूरी थी अभी। वह शहर के कौने कौने जाकर एक खूबसूरत बगीचा भी ढूंढा था जिसमे तुम्हारे पसन्दीदा फूल खिलते थे बारहों महीने उसकी बैठक  भी अभी बाकी थी। तुम्हारे आने के अहसास मात्र से महकने लगता था मेरा शहर जानते हो महक भी अधूरी थी अभी।

मैंने सोचा था कि जब तुम आओगे तो मेरे पसंदीदा गुलाब लेकर मिलोगे तुम ओर अपनी गुलाबी पेहरन में तुम में आ सिमट जाओंगी मैं। ओर एक पूर्ण मिलन हो जाएगा अपना। पर देखो न तुमने सब अधूरा छोड़ दिया ।उर्वी लिखती जा रही थी बुखार से शरीर तप रहा था।

आज अवि को याद नही कर रही थी खुद को कोस रही थी। आज किसी के संगीन मजाक ने उसको भीतर से तोड़ दिया था।   ज़ेहन में यादें  करवटों पर करवटे ले रही थीं।आँसूओं ने आंखों को   लाल कर दिया था।

एक खून की उल्टी और वह बहुत कुछ लिखना चाहती थी अधूरा  ही रह गया।  यह उसकी बदकिस्मती ही थी कि वह अपना खत भी पूरा न कर सकी। ज़िन्दगी ने उसे फिर जहाँ से लौटी थी वही पहुँचा दिया। आज फ़िर वही डॉक्टर वही  ICU का कमरा और वही बेस्वाद दवाइयों की  स्ट्रिप्स औऱ बेइंतहा दर्द के साथ नसों को नीली करती drips...!!

कंटेंट सोर्स : सुरेखा अग्रवाल “स्वरा” लखनऊ सिटी।