इश्क़ का इत्र

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18th September, 2019, Edited by Shivangi Agarwal

फीचर्स डेस्क। हमारी पुस्तक "शब्दमोती" ऐसी 21 कहानियों से सराबोर है, जिसमें पारिवारिक, सामाजिक और पुरानी रुढ़िवादी सोच को परिभाषित करते नायक/ नायिका के उस संघर्ष को दर्शाया गया है जो कहानी को सुखद अंत मे तब्दील करता है। उम्मीद है आप को यह पुस्तक 'शब्दमोती पसंद आएगी। 

इश्क का इत्र

यह कहानी उस पुराने दौर से रूबरू करवाती है जिसमे लड़कियों के लिए नियम कायदे जरूरत से कुछ ज्यादा होते थे, और उनकी जिंदगी का फैसला उनके घरवाले अपनी मर्ज़ी से लेते थे। लड़की का पढ़ना, बोलना, खिलखिलाकर हंसना, खुले आम किसी से बातें करना अमर्यादित समझा जाता था, बस्स यही उद्देश्य होता था कि बेटी के घर के काम मे दक्ष होते ही लड़का ढूंढकर शादी कर देंगे। लेकिन शब्दमोती की कहानी 'इश्क़ का इत्र' में नायिका अरुणा इस सोच और पुराने परिवेश का विरोध करती है नायक सूरज की मदद से...और इसी संघर्ष के दौरान बनता है दोनों के बीच अटूट रिश्ता जिसमे खुश्बू है इश्क़ केइत्र की। इस रोचक कहानी को अवश्य पढियेगा हमारी "शब्दमोती" पुस्तक में।

भाग्य विधाता:

यूँ तो अक्सर ही कहा जाता है कि सबका भाग्य ऊपर वाले के हाथ मे है, लेकिन 'भाग्य विधाता' कहानी की नायिका गंगा की जिंदगी का भाग्य विधाता सच्चे मायनो में बना मनोहर...जिसने गंगा की जिंदगी की विषम परिस्थितियों में भी उसका साथ दिया, गंगा की जिंदगी में सूनापन भर रहे श्वेत रंग की जगह मनोहर ने भरे प्यार के रंग और समाज मे उसके अस्तित्व का एक नया अर्थ परिभाषित किया। प्यार से भरी इस खूबसूरत कहानी 'भाग्य-विधाता' से रूबरू होने के लिए अवश्य पढियेगा "शब्दमोती" पुस्तक।

सेल्फी: एक आखिरी अवशेष

दादा-दादी, नाना-नानी एवं उनके पोते-पोतियों के मध्य हमेशा ही एक अटूट एवं प्यार भरा अनूठा रिश्ता होता है, कोई कितना भी प्यार लुटाये बच्चों पर लेकिन बुजुर्गों के वात्सल्य की बात तो कुछ और ही होती है। शायद इसलिए ही तो कहा जाता है कि बुढापा औऱ बचपन एक जैसा ही होता है, इन्हीं रिश्तों की एहमियत और हृदयस्पर्शी एहसास को बयां करती है यह कहानी 'सेल्फी:एक आखिरी अवशेष' जिसे आप पढ़ेंगे सिर्फ और सिर्फ हमारी पुस्तक 'शब्दमोती' में।

लेखिका परिचय

लेखिका ::     कला आरुष नैथानी

एजुकेशन:   एम ए हिंदी साहित्य एवं एम ए अंग्रेज़ी साहित्य से स्नातकोत्तर

शौक :     लेखन कार्य

'शब्दमोती' तक कैसे:   ऑफिस के दौरान हिंदी सप्ताह समारोह में प्रतिभाग करने से महसूस हुआ, उस शौक के ही अनवरत क्रम ने मुझे 'शब्दमोती' पुस्तक तक पहुंचा दिया है।       

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