ज़िन्दगी और शिकायतें...

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20th May, 2019, Edited by Abhishek seth

जाने कितने गम हैं जानने को अभी 
कितने रास्ते हैं चलने को अभी और

धूप में गुज़री ये सारी जिंदगी जिनकी 
हाँ वक़्त है छाँव आने में अभी और !

ख्यालों से जो बना लिया है इक घर मैंने
सुना हैं उस घर मे आने वाले हैं कई और !

वो किस्से किसी से हम न कह सके !
वो किस्से अभी जी रहा है कोई और !

जिनकी रातें रात तकते गुज़र जाती हैं !
करते नहीं शिकायत अब किसी से और !

बेज़ुबान हो गयी है अब जिनकी ज़िंदगी 
उनकी फिकऱ में बोलने आये कई और !

हम गुज़रे थे जिन रास्तों से उन दिनों !
गुज़र रहें हैं आज भी लोग कई और !

बस इक गम था उसे समझ नहीं सका !
हर रोज़ कहता अभी आने हैं कई और !

कई रात गुज़री कई दिन गुज़र गये !
हालातें न बदली न बदला कुछ और !

लोग हँसकर मिले और फिर चले गये !
ज़िंदगी जीने को बची रही थोड़ी और !

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©आशुतोष सिंह