हिन्दी दिवस स्पेशल : अपनों के बीच आज उपेक्षित होती जा रही हिन्दी भाषा !

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14th September, 2017 - 1:20 PM, Edited by Neeraj tripathi

वाराणसी।  14 सितंबर हिन्दी दिवस मनाया जाता है। हिन्दी भाषा को सर्वश्रेष्ठï भाषा माना जाता है। वहीं संंस्कृति से जुडऩे एवं गौरवधारणा का माध्यम भी है हिन्दी भाषा। भारतीय भाषाओं की बात करें तो हिन्दी का एक अहम योगदान है। इसे दुर्भाग्य कहें कि भौतिकवादी युग में हिन्दी को उपेक्षित किया जा रहा है। आज हमारे देश में हिन्दी दिवस एक वार्षिक आयोजन की तरह होता जा रहा है। हर साल जब हिन्दी दिवस आता है तो हमारे यहां लोग इसे एक रस्म अदायगी के रूप में मना कर इतिसिद्घम कर लेतें हैं। जबकि हिन्दी भाषा का प्रचार-प्रसार हमेशा होना चाहिए। जबकि जरूरत है आज कर सरकारी और अद्र्घसरकारी कार्यालयों में हिन्दी भाषा का प्रयोग अधिक से अधिक किया जाय। आज हिन्दी का समाज से अस्तित्व खत्म होता जा रहा है इसके पिछे हम लोग ही जिम्मेदार हैं। एक बार महादेवी वर्मा ने कहा था कि बिना हिन्दी के न भारत का कोई अस्तित्व है न ही संस्कृति। हम पाश्चात्य संस्कृति में भले ही कितना अपना स्वरूप बदल लें परन्तु उसका कोई आधार नही है। हिन्दी को बचाकर ही हम स्वयं का अस्तित्व समृद्घि कर सकते हैं।

आज सिटी के लोग हो या फिर गांव के सभी लोग अंग्रेजी को ज्यादा महत्व दे रहें हैं। जबकि हिन्दी भाषा की जगह बना पाना किसी भाषा के वश की बात नही है। हिन्दी भाषा को लेकर सिटी के हिन्दी अध्यापकों से जानकारी जुटाने पहुंचे परफेक्ट मिशन के प्रतिनिधों के सामने अध्यापकों ने रखें अपना विचार।

हिन्दी के पुरोधा

प्रोफसर योगन्द्र प्रताप सिंह

हिन्दी की निस्वार्थ सेवा के लिए इनको याद किया जाता है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में उन्होंने काव्यशास्त्र एवं तुलसीदास के अतिरिक्त मीरा और कबीर पर प्रकाश डाला। अपने कार्यकाल में इस बात पर जोर दिया कि शोध प्रक्रिया और शोधस्तर पर नियत्रण रखने के लिए एक केन्द्रीय संस्था का सृजन आवश्यक है। जो शोध मूल्याकंन और स्तरीकरण दोनों दिशाओं में संतुलन का ध्यान रखा। उन्होंने शोध प्रकिया में तीन मानकों का ध्यान रखा।

प्रोफसर मालती तिवारी

प्रोफसर मालती तिवारी ने मध्यकालीन आलोचना का अध्यापन का आधार बनाया। इसके अध्यन में नए युग के साहित्य सृजन की सर्वोच्च संभावनाएं खड़ी बोली गद्य में निहित थीं। विशेषरूप से खड़ी बोली की परंपरा प्राचीन है। अमीर खुसरों से लेकर मध्यकालीन भूषण तक के काव्य में इसके उदाहरण विखरे पड़े हैं।

कुछ लोगों में उपेक्षा देखी जा रही है आज के दौर में हिन्दी भाषा को लेकर कुछ लोगों में उपेक्षा देखी जा रही है। अंगे्रजी माध्यम स्कूलों में भी हिन्दी की उपेक्षा की जा रही है और अंग्रेजी भाषा पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। यह एक चिंता का विषय है। हमारी मातृभाषा हिन्दी है हमें हिन्दी से लगाव रखना चाहिए।

आशा यादव, सहायक प्रोफेसर, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू)

हिन्दी हमारी मातृभाषा हिन्दी की लेकर लोगों में एक भ्रम पैदा होता जा रहा है। जबकि हिन्दी हमारी मातृभाषा है, आज सरकारे भी हिन्दी को लेकर काफी चिंतित हैं। वहीं विदेशों से लोग आकर हमारे देश में हिन्दी सीखते हैं। खासतौर पर अभिभावकों को ध्यान देना होगा कि हिन्दी भाषा से भी बच्चे पढ़कर अपना करियर बना सकते हैं।

विजय कुमार, अध्यापक सि़द्ध नारायण स्मारक बालिका इण्टरमीडिएट कालेज

हिन्दी की उपेक्षा ठीक नही

भारत को हिन्दी के वजह से जाना जाता है ऐसे में हिन्दी की उपेक्षा ठीक नही। आज के दौर के अभिभावकों को भी इस पर ध्यान देना चाहिए। हिन्दी एक मात्र ऐसी भाषा है जिसे भारत के कोने -कोने में लोग बोलते हैं और समझते हैं। पहले के समय में हिन्दी के अध्यापक की बहुत सम्मान था। आज भी होना चाहिए।

- ज्योत्सना यादव, प्रधानाचार्या बी0 पी0 इंटर कालेज, पटखौली मसकनवां इलाहाबाद।

हिन्दी का महत्व कम होता जा रहा है

अंगे्रजी माध्यम के स्कूलों के कारण हिन्दी का महत्व कम होता जा रहा है। जबकि आज जरूरत है मातृभाषा को प्रचारित करने की इसलिए ज्यादा से ज्यादा मातृभाषा पर ध्यान देना चाहिए। अभिभावकों को भी यह समझना जरूरी है कि हिन्दी भाषा से भी बच्चे अपने करियर बना सकते हैं।

महक अफताब, दादानगर पब्लिक स्कूल, कानपुर।

हिन्दी विषय पर ज्यादा जोर देना चाहिए हमे अपने सारे कार्य हिन्दी में करना चाहिए। सभी स्कलों और कॉलेजों में हिन्दी विषय पर ज्यादा जोर देना चाहिए। हिन्दी हमारी मातृभाषा है। हमारे यहां हिन्दी भाषा बोलने वालों की संख्या अधिक है।

- श्रीराम अग्रवाल, सरस्वती शिशु मंदिर, श्याम नगर कानपुर।

हर साल हिन्दी दिवस आता है, लेकिन...

हर साल हिन्दी दिवस आता है, चला जाता है। हर साल सरकारी दफ्तरों में, स्वायत्त संस्थाओं में हिन्दी को लेकर कुछ सभाएं हो जाती हैं। बैंकों में कुछ बातें हो जाती हैं। पब्लिक सेक्टर संस्थानों में कुछ हिन्दी-हरकत हो जाती है। कवि सम्मेलन टाइप कुछ हो जाता है। हिन्दी की समस्याओं पर चिंता कर ली जाती है। हिन्दी राष्ट्रभाषा बताई जाती है जबकि वह राजभाषा मात्र है और राष्ट्रभाषा राजभाषा में भेद है। हिन्दी प्रेमी लोग उसे राष्ट्रभाषा ही कहते हैं। तकनीकी तौर पर वह भारत की एक भाषा है और राजभाषा होने के कारण उसे केंद्र सरकारका एक हद तक समर्थन प्राप्त है। पब्लिक सेक्टरों में हिन्दी अधिकारी होता है वह इसलिए। उनके दफ्तरों में हिन्दी राष्ट्रभाषा है, हिन्दी में कामकाज करना चाहिए ऐसे बोर्ड भी लगे होते हैं। कही-कहीं महात्मा गांधी का या अन्य किसी महापुरुष का हिन्दी को लेकर दिया गया वक्तव्य भी लिखा होता है।

अमेरिका हिन्दी सीखना चाहता है लेकिन भारत...

हिन्दी को खतरा पैदा हो रहा है। यह थीम शाश्वत-सी बन चली है। लेकिन तथ्य एकदम अलग बात कहते हैं। तथ्य यह हैं कि हिन्दी लगातार ब? रही है, फैल रही है और वह विश्वभाषा बन चली है। उसकी रीच हर महाद्वीप में है और उसका बाजार हर कहीं है। हमारी फिल्मों के गानों के एलबम अमेरिका, अफ्रीका, एशिया, यूरोप कहीं भी मिल सकते हैं और फिल्में एक साथ विश्व की कई राजधानियों में रिलीज होती हैं। भारतवंशी हिन्दी मूल के लोग दुनिया के हर देश में रहते हैं और उनकी हिन्दी इस हिन्दी जैसी ही है। कहीं-कहीं उसकी लिपि रोमन है, लेकिन हिन्दी सर्वत्र नजर आती है। चीनी भाषा के बाद दूसरी भाषा हिन्दी नजर आती है, ऐसे आंकड़े कई विद्वान दे चुके हैं। अब तो अमेरिकी प्रशासन अपने यहां हिन्दी को सिखाना चाहता है।

कन्नड़ के साथ हिन्दी मौजूद

भारत में कोई तैंतीस-चौंतीस करोड़ लोगों की मातृभाषा हिन्दी है, ऐसा सन 91 के सेंसस ने कहा था। आज हिन्दी चालीस करोड़ से कुछ ही कम की मातृभाषा कही जा सकती है। हिन्दी का दूसरा स्तर हिन्दी बोलने वालों का है, जिनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं है। हिन्दी की व्याप्ति कितनी है, इसका पता इसी बात से चल जाता है कि आप दक्षिणी प्रदेशों में, जैसे केरल में हिन्दी को दूसरी भाषा की तरह बरता जाता देखते हैं। आंध्र, कर्नाटक में कन्नड़ के साथ हिन्दी मौजूद है। तमिलनाडु तक में अब हिन्दी का वैसा विरोध नहीं है जैसा कि सातवें दशक में हुआ था। अब तो तमिल सांसद हिन्दी सीखने की बात करने लगे हैं। मीडिया की मुख्य भाषा हिन्दी है।

हिन्दी की स्वीकृति अब सर्वत्र है

हिन्दी मीडिया अंगरेजी मीडिया से कहीं आगे है। नए राष्ट्रीय पाठक सर्वेक्षण में पहले पांच सबसे ज्यादा बिकने वाले अखबार हिन्दी के हैं। एक अंगरेजी का है, एक मलयालम का है, एक मराठी का और एक तेलुगु का है। एक बंगला का भी है। हिन्दी के सकल मीडिया की रीच इन तमाम भाषाई मीडिया से कई गुनी ज्यादा है। हिन्दी की स्वीकृति अब सर्वत्र है। ऐसा हिन्दी दिवसों के जरिए नहीं हुआ, न हिन्दी को राजभाषा घोषित करने से हुआ है।

ऐसा इसलिए हुआ है कि हिन्दी जनता और मीडिया का नया रिश्ता बना है। यह बाजार ने बनाया है जिसे हिन्दी के विद्वान कोसते नहीं थकते। मीडिया की हिन्दी संचार की जबर्दस्त हिन्दी है। इतिहास में इतने विकट, व्यापक एवं विविध स्तर के संचार की हिन्दी कभी नहीं रही। वह साहित्यिक हिन्दी रहकर संदेश, उपदेश और सुधार की भाषा भर बनी रही। प्रिंट मीडिया ने उसे एक विस्तार दिया, लेकिन साक्षरों के बीच ही। रेडियो, फिल्मों और टीवी ने उसे वहां पहुंचाया जहां हिन्दी का निरक्षर समाज रहता है, उसे एक नई भाषा दी है जो म्युजिकल है। जिसमें एक से एक हिट गाने आते हैं जिन्हें सुनकर पैर थिरकने लगते हैं। हिन्दी टीवी के समाचारों से लेकर मनोरंजन की सबसे बड़ी भाषा है।

साहित्य भी मरा नही है

हिन्दी जनता सबसे बड़ी उपभोक्ता जमात है। उसे संबोधित करने के लिए कॉर्पोरेट दुनिया विज्ञापन हिन्दी में पहले बनवाती है। यही हिन्दी की गुरुत्वाकर्षकता है। वह कॉर्पोरेट के लिए आकर्षक और सबसे बड़ा बाजार देती है। कंपनियां उसमें संवाद करती हैं। ब्रांड करती हैं। इससे एक विनियम की नई हिन्दी बनी है। साहित्य भी मरा नहीं है, वह छोटी पत्रिकाओं में रह रहा है। वही उसकी जगह भी थी। साहित्यकार अब संख्या में ज्यादा हैं चाहे वे खराब हिन्दी ही लिखते हों। तब खतरे की लॉबी बनाना क्या तर्कसंगत है। हिन्दी दिवस मनाएं, न मनाएं...कम से कम इस पैरानॉइया से तो मुक्त हों जो हर वक्त हिन्दी पर खतरा मंडराता देखने का आदी है।