सीख

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3rd June, 2019, Edited by Focus24 team

फीचर्स डेस्क। आज हाथ में नियुक्ति पत्र लेकर, आँखों में खुशी के अश्रु लिए संदीप आत्मचिंतन में डूबा हुआ था। संघर्षमय जीवन के क्षण चलचित्र के समान सजीव हो उठे थे। उन घटनाओं से सीख लेकर उसने यह संकल्प लिया कि अर्जित धनका दस प्रतिशत वह स्वयं के लिए सुरक्षित रखेगा। वह उन्हें अपने अन्य कर्त्तव्यों के नाम पर या स्व-सम्बन्धों के लिए भी व्यय नहीं करेगा। कारण जब वह स्वयं दृढ़ता से समस्याओं के समक्ष खड़ा रहेगा तभी तो वह अपना और अपने लोगों की सहायता करने में समर्थ हो सकेगा। उस घटना ने उसके जीवन में भविष्य के विषय में नया दृष्टिकोण प्रदान किया।आर्थिक रूप से सदैव सुदृढ़ रहने की आवश्यकता का आभास कराया।उसको इस सत्य का बोध कराया कि जीवन में पैसा सब कुछ नहीं होता।पर हाँ, बहुत कुछ तो होता ही है।

बात उन दिनों की है जब वह स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात परास्नातक में प्रवेश लेना चाहता था।वह प्रथम श्रेणी में स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण कर अत्यंत प्रसन्नता के साथ पिताजी के पास पहुँचा और स्नेहाशीष भी पाया।संदीप के पिताजी एक साधारण किसान थे।अब उन्हें संदीप से नौकरी या व्यवसाय की अपेक्षा थी;जिससे वह उनके दायित्व में सहयोग कर सके। वैसे भी संयुक्त परिवार में संदीप के अध्ययन व रहन-सहन का भार उनके छोटे भाई ने उठाया हुआ था।अबकी बार उसने अपनी असमर्थता पहले ही प्रकट कर दी थी। संदीप की पढ़ने की इच्छा से अधिक उन्हें बड़ी बेटी आस्था के विवाह की आवश्यकता अनुभव हो रही थी।अतएव उन्होंने आर्थिक सहायता हेतु स्पष्ट मना कर दिया।

संदीप ने बहुत अनुनय-विनय किया परन्तु परिणाम कुछ नहीं निकला।अंततः उसने नौकरी का अन्वेषण प्रारम्भ किया।तीव्र व कुशाग्र बुद्धि के स्वामी संदीप को शीघ्र ही एक कंपनी में निरीक्षक अर्थात् सुपरवाइजर की नौकरी भी मिल गई। ईमानदारी और परिश्रम के द्वारा शीघ्र ही पर्याप्त धनार्जन भी कर लिया।

  तभी घर से पिताजी का पत्र आया कि आस्था के लिए एक सुयोग्य वर मिल गया है।उसने पत्र पाते ही बहन के विवाह की तैयारियाँ प्रारम्भ कर दी।वह आस्था के विवाह में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहता था।

विवाह की तिथि समीप आने पर उसने छुट्टियाँ ले ली और स्वसामर्थ्य अनुसार उपहार व वस्तुएँ लेकर घर पहुँच गया।संदीप को देख पिताजी का भी उत्साह दुगुना हो गया।बड़े ही उत्साह के साथ विवाह का आयोजन समाप्त हुआ।आस्था की विदाई का कार्यक्रम भी सम्पन्न हुआ।संदीप ने जो कुछ भी उसके पास था सबकुछ व्यय कर दिया। विवाह के आयोजन में वह लगभग एक महीने घर पर रुक गया।कम्पनी से फोन भी आया परन्तु पिताजी का मुख देख कर वह जा नहीं पाया। परिणामस्वरूप नौकरी भी जाती रही।

आस्था की विदाई को एक महीना बीत चुका था।सबकी जीवनचर्या सामान्य हो चुकी थी। संदीप को भी फिर से नौकरी ढूढ़ना था।नयी नौकरी से पूर्व कुछ दिनों के लिए रुपयों की भी आवश्यकता थी। अतः उसने पिताजी से कुछ रुपए उधार माँगे। उन्होंने अपनी असमर्थता जताते हुए कहा,"ऐसा भी क्या उत्साह था कि तुम्हें भविष्य की चिन्ता न थी । मैंने तो तुमसे नहीं कहा था कि सबकुछ लुटा दो।तुम्हें सहयोग सामर्थ्य के अनुसार करना था । "

पिताजी के वचन सुनकर संदीप अवाक् था।उस समय क्रोधित होकर आवश्यकता के कुछ सामान लेकर वह कानपुर वापस लौट आया।उसे सारे सम्बन्ध स्वार्थवश जुड़े हुए प्रतीत हो रहे थे। इधर कम्पनी में पुनः प्रयास किया परन्तु वहाँ नया व्यक्ति स्थान ले चुका था।हताश संदीप कमरे पर जब आया तब उसे बड़ी भूख लगी थी।घर पर भोजन सामग्री भी नहीं थी। घर जाते समय राशन नहीं लाया था । सोचा था क्या करूँगा सब लाकर,बचे पैसे किसी और काम आ जाएँगे।

डब्बे में थोड़ा सा आटा था।सोचा कि दो रोटियाँ बनाकर चीनी से खा लूँ लेकिन उसमें पानी अधिक डल गया।मानो 'ग़रीबी में आटा गीला' की कहावत चरितार्थ होने पर लग गई हो। अंततः हारकर उसे गाय को डाल दिया कि उसकी नहीं तो गाय की ही भूख शान्त हो जाए। दो गिलास पानी पीकर वह सो गया।

भला ! भूखे पेट नींद किसे आती ? सो पिताजी की बातें मस्तिष्क में घूमने लगी। उनके वचन कठोर ही सही परन्तु कहीं न कहीं सत्य भी थे। यदि मनुष्य स्वयं सुदृढ़ न होगा तो वह क्या किसी की सहायता करेगा अथवा सहारा बनेगा। आज उसे अपने सबसे बड़ी सीख मिल गई थी और उसने प्रण लिया कि अब वह अर्जित धनराशि का दस प्रतिशत मात्र अपने लिए रखेगा। जिससे उसे कभी भी व किसी भी परिस्थिति में किसी के समक्ष हाथ न फैलाना पड़े। सहायता भी करनी हो तो अपनी मर्यादा का ध्यान रखना है। तभी हम स्वयं को और अपने से जुड़े लोगों को प्रसन्न रख पाएंगे।यदि दुःख का सामना नहीं करना है तो किसी से आशा भी नहीं रखना चाहिए। बुज़ुर्गों ने सच ही कहा है कि," घर फूँक कर तमाशा नहीं देखना चाहिए।

- डॉ. उपासना पाण्डेय, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश।