सलाम : शहीद की पत्नी को हथेलियों पर पैर रखवाकर कराया ग्रृहा प्रवेश

Slider 1
Slider 1
Slider 1
Slider 1
Slider 1
Slider 1
Slider 1
« »
17th August, 2019, Edited by manish shukla

अमरीश मनीश शुक्ल
स्पेशल स्टोरी : भारत क्यों अनूठा और यहां देश प्रेम किस कदर लोगों में कूट कूट कर भरा है, इसकी एक और बानगी मध्य प्रदेश के भोपाल शहर में देखने को मिली है। देश की सेवा करते हुए 27 साल पहले शहीद हुये सीमा सुरक्षा बल के सिपाही मोहन सिंह की शहादत को गांव वालों ने इस तरीके से सलाम किया है, जिसके मिशाल आने वाली कयी पीढियां देंगी और सरकार को भी आइना दिखाती रहेंगी। खंडर में अपने बच्चों के साथ जीवन बसर कर रही शहीद की पत्नी के लिये गांव वाले आगे आये और चंदा जुटाकर 10 लाख रूपये से उनके लिये मकान बनवाया। लेकिन, इससे भी बेमिशाल कदम तब युवाओं ने उठाया जब शहीद की पत्नी राजू बाई के गृहा प्रवेश के लिये युवाओं ने अपनी हथेली जमीन पर बिछा दी और हथेली पर चल कर ही उन्होंने ग्रृह प्रवेश किया। यह घटना भारत के उन शहीदों की आत्मा को राहत देने वाली होगी, जो हंसते हंसते अपने प्राण मातृ भूमि के लिये न्यौछावर कर देते हैं। 

1992 में हुये थे शहीद 
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि सीमा सुरक्षा बल के सिपाही मोहन सिंह 31 दिसंबर 1992 को अपना सर्वोच्च बलिदान कर अमर हो गये थे। लेकिन आज तक उनके परिवार को सम्मान से जीने के लिये एक अदद छत तक नसीब नहीं हो सकी थी। जिस वक्त मोहन सिंह शहीद हुये उस वक्त राजू बाई गर्भवती थीं। जबकि उनका तीन वर्ष का एक बेटा अपने पिता का हमेशा के लिये इंतजार करता रह गया था। आर्थिक तौर पर कमजोर मोहन सिंह , परिवार का एकलौता सहारा थे और उनकी शहादत के बाद उनकी मदद के लिये ऐसे कोई कदम नहीं उठाये गये, जिससे वह सम्मान से जी सकती। 

खण्डहर में रह रही थी 


मोहन सिंह के साथ जिस घर में राजू बाई ने गृहस्थी की शुरूआत की वह कच्चा घर था और समय के साथ यह घर टूटते टूटते खण्डर में तब्दील हो गया। मोहन सिंह के शहादत के बाद पेंशन ही परिजनों का सहारा थी, लेकिन दो वक्त की रोटी का इंतजाम ही उतने में हो जाये यह बड़ी बात थी। वर्षों तक सभी को इंतजार रहा कि शायद सरकार उनकी आर्थिक स्थिति को देखे, शायद कोई कदम उठाये, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और यह परिवार जर्जर घर में जर्जर स्थिति में जीने को विवश था। 

 लोगों ने बनवाया घर 


मोहन सिंह के परिवार की मदद के लिये शहीद समरसता मिशन के संस्थापक मोहन नारायण ने सबसे पहले पहल शुरू की और राजू बाई को घर देने के लिये वन चेक-वन साइन नाम से अभियान चलाया। लोगों ने शहीद के परिवार के लिये मदद देनी शुरू की और 11 लाख रूपये एकत्रित हो गये।  1 साल के अंदर 10 लाख रूपये से मकान बना दिया गया और अब 1 लाख बचे रूपये से शहीद की मूर्ति यहां स्थापित की जायेगी। 

हथेलियों पर पैर रखकर किया गृह प्रवेश 


15 अगस्त को जब पूरा देश स्वतंत्रता दिवस मना रहा था उस समय ग्रामीणों ने भी राजू बाई को अद्भुत सम्मान दिया और गृह प्रवेश करने के लिये जमीन पर अपनी हथेलियां बिछा दी। राजू बाई हथेलियों पर पैर रखते हुये घर में दाखिल हुई और पति की शहादत पर गर्व करते हुये बोली  सम्मानित कर गृह प्रवेश कराया गया। इस दौरान लोग उनकी राह में अपनी हथेलियां बिछाकर बैठ गए, जिन पर चलकर राजू बाई अपने नए घर तक पहुंचीं।

अब बेटा बीएसएफ में पहुंचा 


पति की शहादत के बाद भी राजू बाई के सीने से देश भक्ति का जज्बा कम नहीं हुआ, बल्कि और वह इतना बढ़ गया कि अपने उसी बेटे को जो पति की शहादत के वक्त पेट में था, उसे बचपन से सेना में जाने के लिये प्रेरित किया। और आखिर कार वह घड़ी भी आ गयी, जब अब बीएफएफ में भर्ती हो गया है।  राजू बाई कहती हैं कि उन्हे अपने पति पर गर्व है और अब उनका बेटा भी उनके पति की तरह देश की रक्षा करेगा। अगर आज भी होते तो यही चाहते कि उनका बेटा सेना में जाये, मैने उनकी इच्छा को पूरा करने के लिये बेटे को प्रेरित किया और बेटे ने आज पिता का नाम रोशन कर दिया है।