valentine day special ... याद आता है गोलगप्पे वाला प्यार ! 

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6th February, 2017 - 10:04 PM, Edited by Neeraj tripathi

लखनऊ। तुम्हें गोलगप्पे बहुत पसंद थे। लेकिन रोजना घर से सिर्फ एक रुपये मिलने के कारण मैं तुम्हारी इच्छा पूरी न कर पाने का मलाल लिए रोज स्कूल से घर लौटता था। तारीख तो ठीक से याद नहीं पर बात 1988 की है यह भुलने का सवाल ही नहीं उठता, खासतौर पर जब पापा से हमने झूठ बोला था कि स्कूल में 5 रुपए जमा करने है प्रैक्टिल के फीस के लिए। पापा ने भी पांच रुपए ऐसे कष्टï से दिये थे जैसे उन्होंने अपनी जागीर किसी पड़ोसी को बिना किसी रुपए के एवज में उसके नाम कर रहे हों। उस दिन जब मेरे जेब में 1-1 रुपए के पंाच सिक्के आए तो अमेरिका के ट्रंप से अपने को कम नहीं समझ रहा था।

रास्ते में बिहारी चाचा की गोलगप्पे की दुकान थीे। स्कूल आते जाते बच्चों को चाचा ऐसे देखते थे जैसे किसी मंदिर के बाहर बैठा भिखारी सामने वाले से उम्मीद कर रहा हो कि फुटकर न होने के कारण 10 की नोट मिल जाए। हालांकि चाचा कि दुकान चलती भी खूब थी। यह बाते उस समय के छात्र ही जानते होंगे। उस दिन छुट्टïी होने के बाद मैने तुमसे कहा था कि चलो आज गोलगप्पे खाते हैं।

उस समय तुम्हारे मन में सूर्य देवता का पश्चिम दिशा से उगने जैसे ख्याल आने लगे थे। तुमने कहा- नहीं मुझे नहीं खाना। शायद यह समझ रही हो कि या तो मै मजाक कर रहा हूं, या फिर पैसे कहीं से चोरी कर के ले आया था। हालांकि काफी मान मनौव्वल के बात तुम गोलगप्पे खाने को राजी हुई लेकिन एक रुपए के 8 गोलगप्पे मिलने के बावजूद तुमने पांच के बाद ना कर दिया था। जबकि मैं और खाओं ऐसा कह रहा था जैसे कि अमेरिका को खरीदने की औकात रखता था।

हालांकि वो बात भी याद है जब तुमने बदनामी के डर से कहा था कि तुम चाचा को गोलगप्पे बोलकर दूर ही रहना और पैसे बाद में दे देना। तुम्हारी यह बात भी ठीक लगती है अब। क्योंकि क्लास में मेरी शायद इमेज कुछ ठीक नहीं थी। तुम अपने नाम के साथ मेरे नाम लगने से डरती थी, लेकिन पता है कि तुम मुझसे प्यार करती थी। लेकिन जब तुम गोलगप्पे खाने को तैयार हुई तो तेरे दिल के अथाह सागर में मेरे प्रति प्रेम की मछली गोते लगा ले.... खैर गोलगप्पे की दुकान आई... मै रुका और चाचा को आर्डर देते समय अपने को प्राउड फिल कर रहा था।

चाचा समझ रहे थे कि पैस तुम दोगी क्योंकि पूरे साल कभी गोलगप्पे के दुकान पर न जाने वाले लड़के से पैसे देने की उम्मीद उनको तो कत्तई नहीं थी। लेकिन चाचा ने अपने तसल्ली के लिए आंखों से ईशारा करके मेरा मन टटोल लिया था कि पैसे कौन देगा। जब मैने ईशारा करते हुए आंख मारी तो चाचा पहली बार किसी कसाई वाले चाचा से नेहरू चाचा की तरह लग रहे थे। हालांकि तुमने जल्दी-जल्दी पांच गोलगप्पे गटके और तेजी से घर की तरफ भागी। तुम पिछे मुड़कर देखोगी और मन ही मन थैक्स बोलोगी इसी ख्यालों में तब तक देखता रहा जब तक तुम आंखों से ओझल नहीं हो गई।

जब तुम्हारा साया दिखना बंद हुआ तो मेरा मन गोलगप्पे का पानी पीने का किया। मैने कहा चाचा मुझे भी खिला दो। चाचा ने कहां सभी गोलगप्पे के लिए पैसे तो हैं न मैने कहा हां चाचा। धीरे धीरे स्कूल के दिन पूरे हुए मैं कालेज ज्वाइन करने के लिए लखनऊ चला गया और तुम शादी करके मेरे जैसे शायद वकील बेटा के ख्याल में डुब गई। आज मैं पेशे से वकील हूं। तुम्हारी याद बहुत आती है। तुम्हारी याद में आज भी गोलगप्पे खाता हूं।

लेकिन जब पत्नी कहती है कि गोलगप्पे खाने की आदत कैसे लगी तो कुछ बताने के बजाय कहना होता है कि इसका पानी पेट के लिए बहुत फायदेंमंद होता है। पत्नी खुश, तुम अपने घर में खुश और मैं गोलगप्पे के पानी पीकर नशे में खुश॥ 

                                                                                                                                                   ।। हैप्पी वैलेनटाइन डे।।