मगध शासक सम्राट अशोक द्वारा स्थापित श्रीनगर में मगध का लोकपर्व छठ क्यों नहीं हो सकता है?

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11th August, 2019, Edited by manish shukla

कुंदन कुमार 
दशकों पूर्व पंजाब के वाल्मीकि समुदाय के पाँच सौ से भी अधिक परिवार कश्मीर में जाकर बसें। दशकों से ये एकमात्र समुदाय कश्मीर की स्वच्छता का दायित्व अपने कंधे पर लिये हुये है, लेकिन आज तक इन्हें वहाँ का स्थायी निवासी प्रमाणपत्र या अनुसूचित जाति की श्रेणी एवं तत्संबंधित लाभ भी नहीं मिला है। ये दलित समुदाय बिना किसी न्यूनतम श्रम दर के पीढ़ियों से वहाँ अपने शोषण के लिये अभिशप्त हैं। बहुधा, कश्मीर कश्मीरी पंडितों, सुन्नी बहुसंख्यक मुस्लिमों या जब कोई चित्तिसिंगपुरा जैसा नरसंहार हुआ, तो सिख समुदाय की चर्चा तक ही सीमित रहा है।

      अभिलेखित इतिहास तथा कश्मीर के अनेक भग्नावशेष स्पष्ट रूप से प्रमाणित करते हैं, कि कश्मीर कभी बौद्ध धर्म का भी एक प्रमुख केन्द्र था। श्रीनगर की स्थापना ही स्वयं मौर्य शासक सम्राट अशोक ने की थी। इस तथ्य का उल्लेख कश्मीर के इतिहास से संबंधित प्रमुख ग्रंथ कल्हण कृत राजतरंगिणी में भी हुआ है। दुर्भाग्य से इतिहास के इस महत्वपूर्ण पक्ष को वहाँ पुनर्स्थापित करने की चर्चा कभी नहीं होती है। मगध शासक द्वारा स्थापित श्रीनगर में मगध का लोकपर्व छठ क्यों नहीं हो सकता है? दलित अधिकार ही नहीं, स्त्री अधिकार, बाल अधिकार, आदिवासी, अल्पसंख्यक इत्यादि किसी भी वंचित-उपेक्षित समुदायों के मूल नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिये पूर्व जम्मू-कश्मीर राज्य में कोई सक्षम व्यवस्था नहीं थी। देश के तथाकथित प्रगतिशीलों को भी कश्मीर की इस भीषण अराजकता पर कभी किसी ने लिखते-बोलते नहीं देखा है।

लेखक 
कुंदन कुमार 
स्वतंत्र लेखक