Valentine day Special :  तुम्हारा साथ ...

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8th February, 2019, Edited by Shikha singh

फीचर्स डेस्क। दरवाजे के बाहर एक कदम निकला ही था कि पीछे से शिखा ने कहा थैंक्स। लेकिन किस बात की थैंक्स ये सोचने और पूछने का वक्त नहीं था। रात को विस्तर पर था अनगिनत करवटे और न जाने कितने विचारों के बाद रात कटी और सुबह 8 बजे फिर कैम्पस में था। इस बीच हर रोज सामना तो होता रहा पर बच्चे कैसे पढ़ रहें है पूछा तक नहीं। लेकिन सामने आने पर शिखा की पलक न झपकना हर रोज अनगिनत प्रश्न छोड़ जाते थे।  

सुबह से दोपहर के बीच एक बार सामने से गुजर जाना और फिर किसी न किसी बहाने मेरे पढ़ाने के टाइम दीदी के घर आ जाना उसके रूटीन में शामिल होने लगा। अभी पढ़ाते हुए 2 महीने हुए थे की शिखा ने दूसरी चाल चल दी, उसने अपने घर के बगल 11वीं की स्टूडेंट्स को पढ़ाने के लिए जिद कर डाली। अब मेरे आसपास रहने के लिए उसके पास तीन जगह बन गए। कैम्पस के बाद दीदी के घर लगभग हर तीसरे दिन और घर के बगल जाता तो अपने गेट के बाहर उसी समय आ जाना या फिर किसी बहाने उसके घर आ जाना जैसे जान बुझकर शरारत हो।  

अब तक मेरे पास पांच टूयूशन थे जिसमे से तीन उसके इर्दगिर्द।  वैसे रहते अपने-अपने घर लेकिन सुबह से शाम तक में कई बार मुलाकात ने नजदीक आने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। दीदी के घर पढ़ते समय उसके आने का इंतजार और बगल में जाने पर उसका घर पहले देखना रूटीन होने लगा था। ऐसे में तीन साल बीत गए और इस बीच उसके घर वाले भी काफी क्लोज हो गए तो घर भी आना जाना होने लगा।  

जून का महिना था मै शाम को घर पहुचा तो घर में शिखा और बड़ी भाभी थीं। मैंने कहा शिखा मै 15 को दिल्ली जा रहा हु। भाभी अंदर थी उसने सीधे आकर मेरा गला पकड़ लिया और सिर्फ इतना बोली जान ले लूगी और तेजी से पीछे हटते हुए सामने सोफे पर जा गिरी। मै कुछ बोलता की भाभी पानी लेकर आ गई और बोली दिल्ली क्यों। अब मैं कुछ बोलने वाला ही था की उसने कहा जाओ कौन रोक रहा है। एक साथ दोहरा पन- “जान लें लूगीं और कौन रोक रहा है” आँखों में गजब का सुखापन और पूरा चेहरा लाल। मुझे एक पल “अब न देखने का बहाना और आज घर से न जाने देने कि पूरी कोशिश” शिखा का ये पहला दर्द था। मेरे पास कोई और दूसरा रास्ता भी नहीं था।  कल आते हैं कहकर खड़ा हुआ तो भाभी ने कहा चाय बन गई है और शिखा ने कहा कोई जरुरत नहीं।  

आज उसके घर से निकलते समय मै पीछे मुड़ा तो गेट पर कोई नहीं था शायद यह पहला दिन था। क्या कर रहा हूँ मै बार-बार सिर्फ अपने से यही प्रश्न पर जवाब कुछ नही। रूम पर आया तो टिफिन अंदर किया और विस्तर पर पड़ गया। आज मेरे जेहन में अनगिनत यादें थी और हजारो छोटे-छोटे कागज के तुकडे जो उसने कालेज, दीदी के घर और बगल के टूयूशन पढ़ते हुए चोरी से दिए थे। रात भर उनको पढता रहा और उनको और “छोटा” करता रहा।  सुबह हुई तो कालेज नहीं गया। दीदी के यहाँ पढ़ाने पहुचा तो गेट नाक किया तो शिखा ने ही खोला और बोली बच्चे नहीं हैं। दीदी हैं- हा पर क्यों? बात करनी है बोलकर अंदर की तरफ बढ़ा। मैंने बता दिया है शिखा ने रोते हुए कहा। सामने सोफे पर था दीदी आईं सिर्फ ये बोली नितेश इसने क्या बिगाड़ा था तुम्हारा? मतलब दीदी, उन्होंने कहा देखो मतलब तो मुझे बहुत पहले से पता था। और यही बात करने के लिए बच्चों को कही भेज दिया।  

दीदी रोकने की बात कर रहीं थी और शिखा बोलती रहीं जाने दो दीदी। शिखा चाय बनाओ, मझे नहीं आता दीदी।  अपने दुपट्टे को मुह में डालकर सिसकियाँ लेने लगी। देखों पंडित जी ये मर ही जाएगी, दीदी ने “पंडित जी” पहली बार बोला था। बहुत देर तक साथ रहे और इसी के साथ 15 में एक दिन कम हो गया। रूम पर आया और फिर न जाने कितनी जल्दी सुबह हो गया। तीन साल की इतनी यादें थी कि लिख पाना मुश्किल है। दर्द की इंतिहा के साथ-साथ अब मेरे लिए कपड़े और ले जाने के लिए बैग वैगरह दीदी के साथ ख़रीदा जाने लगा। न जाने कितने तरह के लड्डू बन रहे थे। सिर्फ एक दिन बचा था तो शिखा ने कहा पता नहीं जिन्दा रहू या नहीं रहू एक “ढोसा” खिलाओगे। हा दीदी भी चलेगी।

क्यों ?

दरअसल, तुमसे अब अकेले मिलने में डर लगता है। शिखा ने ऐसे वर्ड पहली बार यूज किया था मेरे लिए। हम साथ गए। टेबल की तरफ बढ़ा ही था की शिखा ने कहा नहीं, अब उस टेबल पर कभी नहीं और ये रेस्ट्रोरेन्ट आना मेरे लिए आखिरी है। आज शिखा ढोसे को ऐसे देख रही थी जैसे सारा कसूर उसी का हो। किसी ने एक टुकड़े तो किसी ने दो टुकड़े और वापस घर आ गए। कल जाना था रात 9 बजे की ट्रेन।  

रात को कुछ दोस्त के साथ स्टेशन पर था ट्रेन आने वाली थी, मै जानते हुए भी बार बार इधर-उधर देख रहा था पर शिखा कही नहीं दिखी।  ट्रेन आई और मै बोगी की तरफ बढ़ा ही था की एक तेज आवाज आई नितेश!

क्रमशः इनपुट सोर्स : नीरज त्रिपाठी, कानपुर सिटी।