जन्माष्टमी स्पेशल : श्रीकृष्‍ण जन्म के ये बातें बदल सकती हैं आपका जीवन

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2nd September, 2018, Edited by Pratima Jaiswal

कानपुर सिटी।  श्रीकृष्ण हिन्दू धर्म में सर्वोच्च हैं। वे हिन्दू धर्म के केंद्र में हैं। उनका जन्म, जीवन और मृत्यु तीनों ही बहुत ही रहस्यमयी है। उन्होंने जीवन को संघर्ष की बजाय उत्साह और उत्सव में बिताने का उदाहरण प्रस्तुत किया है। हालांकि भगवान श्रीकृष्ण का संपूर्ण जीवन ही संघर्ष में व्यतीत हुआ लेकिन फिर भी उन्होंने अपने जीवन के प्रत्येक संघर्ष या संकट को बहुत हल्के में लेकर उसे अपनी तरह से संचालित किया। कहना चाहिए कि उन्होंने अपने जीवन को रोचक, रोमांचक और ऐतिहासिक बनाने के लिए खुद ही संकट और संघर्ष को जन्म दिया। आओ जानते हैं उनके जन्मकाल के पांच ऐसे रहस्य जिन्हें जानकर आप भी प्रेरित होंगे।

रात 12 बजे उस वक्त शून्य काल था

भविष्यवाणी के अनुसार भगवान विष्णु को देवकी के गर्भ से कृष्ण के रूप में जन्म लेना था, तब अपने 8वें अवतार के रूप में 8वें मनु वैवस्वत के मन्वंतर के 28वें द्वापर में भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की रात्रि के 7 मुहूर्त निकल गए और 8वां उपस्थित हुआ तभी आधी रात के समय सबसे शुभ लग्न उपस्थित हुआ। उस लग्न पर केवल शुभ ग्रहों की दृष्टि थी। गौरतलब है कि कृष्ण की आठ ही पत्नियां थी। आठ अंक का उनके जीवन में बहुत महत्व रहा है। निश्चित ही प्रत्येक व्यक्ति को भी अपने जन्म के रहस्य को समझना चाहिए, क्योंकि हर व्यक्ति के जन्म में छुपा है उसके जीवन का सार।

मुक्ति ही जीवन का लक्ष्य

जब भगवान श्रीकृष्‍ण का जन्म हुआ तब भारी बारिश हो रही थी और यमुना नदी में उफान था। उनके माता और पिता को उनकी मृत्यु का डर था। अंधेरा भी भयंकर था, क्योंकि उस वक्त बिजली नहीं होती थी। ओशो रजनीश कहते हैं कि कृष्ण का जन्म अंधेरी रात में होता है और वह भी बंधन में, कारागृह में। प्रत्येक व्यक्ति का जन्म इसी तरह होता है। मन के अंधेरे से और कारागृह से मुक्ति ही जीवन का लक्ष्य होना चाहिए। बीज अंधेरे में ही फूटता और पनपता है।

गोकुल मायका और नंदगांव में ससुराल

कुछ दूरी पर ही यमुना नदी थी। उन्हें उस पार जाना था लेकिन कैसे? तभी चमत्कार हुआ। यमुना के जल ने भगवान के चरण छुए और फिर उसका जल दो हिस्सों में बंट गया और इस पार से उस पार रास्ता बन गया। कहते हैं कि वसुदेव कृष्ण को यमुना के उस पार गोकुल में अपने मित्र नंदगोप के यहां ले गए। वहां पर नंद की पत्नी यशोदा को भी एक कन्या उत्पन्न हुई थी। वसुदेव श्रीकृष्ण को यशोदा के पास सुलाकर उस कन्या को ले गए। गोकुल मां यशोदा का मायका था और नंदगांव में उनका ससुराल। श्रीकृष्ण का लालन-पालन यशोदा व नंद ने किया।

पूतना को अपनी माया से मार दिया

जब कंस को पता चला कि छलपूर्वक वसुदेव और देवकी ने अपने पुत्र को कहीं ओर भेज दिया है तो उसने तुरंत चारों दिशाओं में अपने अनुचरों को भेज दिया और कह दिया कि अमुक-अमुक समय पर जितने भी बालकों का जन्म हुआ हो उनका वध कर दिया जाए। पहली बार में ही कंस के अनुचरों को पता चल गया कि हो न हो वह बालक यमुना के उस पार ही छोड़ा गया है। उस बालक को मारने के लिए पूतना नामक राक्षसनी को भेजा जाता है लेकिन श्रीकृष्‍ण ने पूतना को नंदबाबा के घर से कुछ दूरी पर ही अपनी माया से मार दिया। इसके बाद नंदगांव में कंस का आतंक बढ़ने लगा तो नंदबाबा ने वहां से पलायन कर दिया।

जन्म के समय छह ग्रह उच्च के थे

कहते हैं कि श्रीकृष्ण के जन्म के समय छह ग्रह उच्च के थे। उनकी कुण्‍डली में लग्न में वृषभ राशि थी जिसमें चंद्र ग्रह था। चौथे भाव में सिंह राशि थी जिसमें सूर्य विराजमान थे। पांचवें भाव में कन्या राशि में बुध विराजमान थे। छठे भाव की तुला राशि में शनि और शुक्र ग्रह थे। नौवें अर्थात भाग्य स्थान पर मकर राशि थी जिसमें मंगल ग्रह उच्च के होकर विराजमान थे। 11वें भाव में मीन राशि के गुरु उच्च के होकर विराजमान थे। हालांकि कई विद्वान उनकी कुण्‍डली के ग्रहों की स्थिति को इससे अलग भी बताते हैं। कुछ के अनुसार केतु लग्न में था तो कुछ के अनुसार छठे भाव में।