वेलेंटाइन स्पेशल : तुम्हारा साथ

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7th February, 2019, Edited by Shikha singh

फीचर्स डेस्क। अरे नितेश सर ! पीछे मुड़ा तो फर्स्ट इयर की शिखा मै यूनिवर्सिटी कैम्पस से बाहर न निकल जाऊ अपने कदमो को तेजी के साथ आगे बढ़ाते हुए जल्द हम तक आ जाने की कोशिश कर रही थी। हां। क्या बात है ? कुछ खास नहीं सर, मेरा नाम शिखा है। अच्छा तो ? सर आपके बारें में प्रिया दी बताई थीं तो आपसे बात करनी थी।  ओह, हा बोलो। सर आप छोटे बच्चों को टूयूशन देते हो? हाँ- पर क्यों ?

दरअसल, सर मेरी दीदी के तीन बच्चे हैं उनको पढ़ाना था। अपनी बात पूरी करने के बाद पूरी आशा से मेरे फेस को देख रही थी। क्या बताया अपना नाम ? जी शिखा। हाँ शिखा मेरे पास तो अब टाइम नहीं है। सर प्लीज कल सोच कर बताइएगा और जमीन देखने लगी। अच्छा शिखा बताता हूँ। ऐसे में कई दिन बीत गए न मैंने सोचा और न ही उसने पूछा। हाँ- यूनिवर्सिटी कैम्पस में एक बार आमना-सामना होता पर नजरे मिली और दूर हो गया।  

सुबह को कोई 11 बजे थे। हिस्ट्री का लेक्चर चल रहा था। प्रिया ने इशारों से कुछ कहा समझ में तो नहीं आया पर लेक्चर के बाद उसकी बात सुनने की बेताबी जरुर जेहन में उतर गई। हलाकि वह न फ्रेंड थी न कोई और रिश्ता।  बस क्लासमेट कभी कभार हाय-हेलो। लेक्चर पुरे होते ही उसने कहा तुमसे बात करनी है लाइब्रेरी चलो! समझ नहीं पाया ये आदेश था या रिक्वेस्ट पर पीछे-पीछे हो लिया। लाइब्रेरी में जाने का मतलब कुछ किताबे भी लेना लेकर आमने सामने बैठे थे की। एक शिकायत भरी आवाज। शिखा ने कुछ कहा था तुमसे। हा पर टाइम नहीं है। देखो नितेश मुझे नहीं पता पर कुछ रास्ता निकालो। ओह ! एक गहरी साँस ली हलाकि ये मेरी कमजोरी भी है। अच्छा देखता हु। बात यही ख़त्म करना चाह रहा था की वो बोली कल शिखा आपको दी के घर बच्चों से मिलाने ले जाएगी। अरे ! नहीं अब नहीं। अच्छा ठीक है।  

2 बजे के बाद मै कैम्पस से निकल रहा था की 300 मीटर दूर एक पेड़ की निचे खड़ी दोनों बात कर रहीं थी।  नजर उनपर पड़ने की कोई खास वजह नहीं थी बस रास्ता वही था निकलने का। प्रिया ने अगुथा दिखाया तो शिखा ने दोनों हाथ जोड़ा शायद धन्यबाद के लिए। टाइम कैसे मैनेज करू यही सोचते हुए आगे बढ़ रहा था। कालेज से सीधे बच्चों को पढ़ाने निकल जाया करता था, अभी एक घर पहुचा ही था की चाय-पानी के बाद मैंने अपने एक्जाम का बहाना बना कर अब पढ़ा पाने में असमर्थता जताई, हलाकि ये गलत है पर क्या करता। काफी इधर-उधर के बाद वो लोग मानें।  

हेलो सर ! हा शिखा। सर चलिए। तुम्हे कैसे पता की मै हा कर दी।  “सर रात टूटते हुए तारे देखी थी”। ये उसकी पहली तरकस से निकली सम्मोहन तीर था। अच्छा चलो। कैम्पस से लगभग 1000 मीटर दूर बिना कोई बात किए पहुच गए। नमस्ते सर ! जी नमस्ते।  सर मेरे बच्चे पढ़ाने हैं और मैं शिखा की बड़ी बहन। अच्छा। बच्चे कहा हैं ? बस आते ही होंगे स्कूल से। बच्चों के आने तक मेरा पूरा डिटेल्स दीदी ने जाना और शिखा खुद कीचन से कुछ बिस्किट के साथ चाय बनाकर लाई।  

मै कुछ बात करता कि बच्चे आ गए। उनसे मिला और पढाई की वर्तमान कंडीशन जानी और कल से आने का बोलकर निकलना ठीक समझा। सभी ने नमस्ते बोला और शिखा मेनगेट तक छोड़ने आई। एक पाव गेट के बाहर निकाला ही था कि

क्रमशः कंटेंट सोर्स: नीरज त्रिपाठी, कानपुर सिटी।