असीम सुख

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29th April, 2019, Edited by manish shukla

फीचर्स डेस्क। रमाकांत के यहाँ बहुत चहल पहल है। दीपावली नहीं है फिर भी घर को दीपावली की तरह सजाया गया है। मित्र, परिचित, रिश्तेदार सभी उन्हें बधाई देने आ रहे हैं। रमाकांत बधाई स्वीकारते हुए खुशी खुशी सबका मुंह मीठा करा रहे हैं। खुशी की बात तो है ही, दो कन्याओं के बाद रमाकांत को पुत्र रत्न की प्राप्ति जो हुई है। बेटियाँ बहुत खुश हैं, राखी बांधने के लिए उन्हें भाई मिल गया। दादी की खुशी का तो परावार ही नहीं वंश चलाने वाला जो घर आ गया।रमाकांत की पत्नी सुधा भी बहुत खुश हैं बेटा न होने के ताने से उसे मुक्ति मिली। रमाकांत की बेटियों का रंग तो साफ है किंतु नवजात शिशु का रंग सांवला है, पर किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वह लड़का जो है। इसी सांवले रंग की वजह से बचपन से ही उसे सभी श्यामू नाम से पुकारते थे। शैतानी में भी कृष्ण पर गया था बहनों की चोटियां दिन में कई बार खींची जाती उनकी चीजों को छुपाना, दादी से बहनों की झूठी शिकायत कर डांट पड़वाना इन सभी में उसे बहुत आनंद आता था।

सबका लाड़ला भी था उसकी हर इच्छा पूरी हो जाती थी, इसलिए थोड़ा जिद्दी भी हो गया था। एक बार बड़ी बहन जब पढ़ रही थी चुपके से उसकी चोटी कुर्सी से बांध दी थी जब वह उठी चोटी बंधी होने से कुर्सी सहित गिर गई। काफी चोट आई थी, पहली बार उसे सबकी डांट पड़ी थी। समय के साथ साथ शैतानियां भी कम होने लगी स्कूल पहुंचते पहुंचते उसका नाम श्यामू से श्याम सुंदर नाम हो गया पढ़ाई में बहुत होशियार तो नहीं था औसत दर्जे का था। पर हर साल पास हो ही जाता था। समय भी कितनी तेजी से निकल गया पता ही नहीं चला। उसकी पढ़ाई भी पूरी हो गई दोनों बहनों की शादियाँ हो गई घर सूना हो गया था।अब दादी को उसकी शादी की जल्दी थी। मरने के पहले नतबहु को देखना चाहती थी।

अब तो वह नौकरी भी करने लगा है, जितना मिलता है उसमें वह संतुष्ट हैं उसकी सारी जरूरतें पूरी हो जाती हैं। पत्नी भी सुंदर और सुशील मिली है सबसे बड़ी बात उसकी पत्नी संतोषी है। जिन्दगी से उसे कोई शिकायत नहीं है, इसके लिए भगवान का धन्यवाद करना कभी नहीं भूलता। "किस सोच में डूबे हुए हो जल्दी तैयार हो जाओ,मंदिर नहीं चलना क्या ? "पत्नी ने कहा। "इस दिन का तो मैं कब से इंतजार कर रहा हूँ।" वह कृष्ण भक्त है पर उनके बाल रूप का,उसके मंदिर में सिर्फ बालगोपाल की ही मूर्तियां हैं। उसे रामलीला नहीं रासलीला भाती है। लोग भी उपहार में उसे बालगोपाल की मूर्ति ही दिया करते हैं। जब से उसे मालूम हुआ है कि कालोनी में बालगोपाल का मंदिर बन रहा है उसकी खुशी का ठिकाना ही नहीं था, जब भी समय मिलता वह मंदिर में श्रमदान करता। अब मंदिर बनकर तैयार हो गया बालगोपाल की मूर्ति भी आ गई और आज बालगोपाल की प्रतिष्ठा के पहले श्रंगार होना है। उसने काफी पहले से थोड़ा थोड़ा पैसा बचाना शुरू कर दिया था। उसी पैसों से रेशमी कपड़े पर जरदोजी का काम करवा कर अपने ईष्ट के लिए ड्रेस तैयार की है। साथ ही खूबसूरत चांदी का मोतीचूर का लड्डू भी खरीदा। पत्नी को यह सब नहीं बताया था सरप्राइज़ देना चाहता है।

सभी लोग मंदिर में अपनी सामर्थ्य अनुसार कुछ न कुछ लेकर आए हैं। बालगोपाल की मूर्ति बहुत ही आकर्षक है।घुटने के बल बैठी चलने को आतुर, लगता है जैसे अभी चल पड़ेगी और बोल पड़ेगी।श्रंगार मुकुट से शुरू हुआ, मुकुट, कुंडल, कंठी सभी भक्तों द्वारा सोने के लाये गये थे। शराब का बड़ा व्यापारी अनिल सोने के काम वाली बहुत ही आकर्षक ड्रेस लाया था। वही बालगोपाल को पहनाई गई। श्याम को अपने लाए वस्त्र बालगोपाल को न पहनाने का अफसोस तो हुआ पर मन को समझाते हुए वह ड्रेस उसकी ड्रेस से ज्यादा अच्छी थी,और सबसे अच्छी ड्रेस ही तो बालगोपाल को पहनानी चाहिए। उसने अपना चांदी का लड्डू पंडित जी को दिया पंडित जी बालगोपाल के हाथों में लड्डू रखते उसके पहले ही कुंदन ने सोने का नगीने जड़ा लड्डू पंडित जी को दिया।मोतीचूर का लड्डू पीला होता है, पंडित जी ने श्याम को लड्डू वापस करते हुए कहा, और कुंदन का लाया लड्डू बालगोपाल के हाथ में रख दिया।

कुंदन सट्टे का कारोबार करता था। उसे पैसे की कोई कमी नहीं थी। श्याम बहुत दुखी हुआ पहली बार उसे अपनी गरीबी का एहसास हुआ कि वह अपने ईष्ट को कुछ भी भेंट नहीं कर पाया। ईश्वर का दिया हुआ ही ईश्वर को देकर लोग एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश करने में लगे थे।अब भक्ति कम दिखावा ज्यादा हो रहा था। वहां रुकना अब उसे अच्छा नहीं लगा रहा था। वह प्रसाद लेकर मंदिर के प्रांगण में एक बेंच पर बैठ कर पत्नी का इंतजार करने लगा।तभी उसकी नजर मंदिर के गेट पर खड़ी एक गरीब महिला पर पड़ी।उसकी गोद में एक छोटा बालक था और तीन चार साल का एक बालक उसे पकड़े हुए था वह प्रसाद मांग रही थी लोग उसे दुत्कार रहे थे पर कोई उसे प्रसाद नहीं दे रहा था।

श्याम उठकर गेट के पास जाता है और अपना प्रसाद उस महिला को दे देता है।उस महिला ने दो लड्डू लेकर, दो वापस करते हुए कहा "पूरा प्रसाद अगर मुझे दे दोगे तो घर क्या ले जाओगे।" वह वापस आकर बेंच पर बैठ गया। दोनों बालकों के चेहरे पर लड्डू मिलने की खुशी देख वह फिर गेट के पास जाकर उस महिला को बचे दो लड्डू देते हुए बोला "माँ जी ये आप खा लीजिए।मुझे तो और प्रसाद मिल जाएगा।" वह वहीं बेंच पर बैठा उन्हें लड्डू खाते देख रहा था।

उनके चेहरे पर खुशी देख उसका दुख कुछ काम हुआ। अक्टूबर का महीना ठंड ने दस्तक दे दी थी। बड़ा बालक माँ की फटी साड़ी से अपने को ठंड से बचाने का असफल प्रयास कर रहा था। वह उठता है और जेब में रखे सभी पैसों को महिला को देते हुए, "माँ इन पैसों से इन बच्चों के लिए कपड़े ले लेना,आगे ठंड और बढ़ेगी।" महिला ने बिना कुछ कहे कृतज्ञता से जोड़ लिए पर उसकी आंखे छलक उठी। वह फिर अपनी जगह आकर बैठ जाता है।अब वह दुखी नहीं है। मंदिर के अंदर से आरती की आवाज आने लगी थी। फिर वह महिला की ओर देखता है, अचरज से आंखों को मलकर पुनः देखता है,उसे विश्वास ही नहीं हो रहा, महिला यशोदा और बालक मुस्कुराते हुए कृष्ण और बलराम के रूप सुन्दर वस्त्र पहनें और हाथों में लड्डू लिए हुए दिखाई देते हैं।अपलक देखता ही रह जाता है। फिर वह आंखे बंद कर ईश्वर को धन्यवाद देता है। आंखे खोलने पर महिला पूर्व रूप में दिखाई देती है वह समझ नहीं पा रहा यह दृष्टि भ्रम था या कुछ और। पर अब उसका मन शांत हो गया था और वह असीम सुख का अनुभव कर रहा था।

कंटेंट सोर्स : मधु जैन, संजीवनी नगर, जबलपुर (म.प्र.) ।