वास्तविक सम्मान यह है कि आपकी रचनाए किसी और के होंठों पर सज जाएं : स्वधा

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16th June, 2019, Edited by Shikha singh

लखनऊ सिटी। साहित्यकारों की कलम देश-दुनिया समाज को परिवर्तित करने का हुनर रखती हैं। राष्ट्रीय विकास में उनका योगदान सराहनीय होता है। इसी कारण साहित्य हमारे जीवन का अहम हिस्सा है, साहित्यकार एक लंबी यात्रा तय कर पायदान से शीर्ष पर पहुंचता है उनके संघर्ष को नकारा नहीं जा सकता। अभी हाल ही में लखनऊ की रहने वाली स्वधा रवींद्र "उत्कर्षिता" की फोकस24न्यूज़ से बातचीत के कुछ अंश:-

फोकस24 :- किस विधा में लिखना आपको रूचिकर लगता है? क्यो ?

स्वधा:- लेखन की सभी विधाएं अपने आप में अनुपम हैं। परंतु मुझे छंद बद्ध रचनाओं, गीत और मुक्तक लिखने में अधिक आनन्द आता है क्योंकि इनकी अभिव्यक्ति गया कर की जा सकती है। और संगीत भावाभिव्यति का सबसे उपयुक्त साधन है।

फोकस24 :- लेखन की शुरुआत कब और किससे प्रेरित होकर की गई?

स्वधा :- लेखन की शुरुआत तो कब हुई ये बता पाना ज़रा कठिन है , पर ये अवश्य याद है कि अक्सर फिल्मी गाने गाते हुए उनके बोलों को अक्सर अपने मन के बोलों से बदल दिया करती थी। शायद वहीं से साहित्य सृजन का प्रारंभ हो गया था। मेरे प्रेरणास्रोत तत्कालीन सारे ही कवि रहे , गोपाल दास नीरज जी, हरि ओम पवार जी, ब्रजेन्द्र अवस्थी जी, सभी से बहुत कुछ सीखा।

फोकस24 : साहित्य उत्थान मे आपकी सहभागिता व  आपके लेखन का संघर्षों भरा दौर या उसके पीछे छिपा किस्सा? 

स्वधा :- अभी तक तो कोई संघर्ष करना ही नहीं पड़ा। लिखने के लिए किसी संघर्ष की आवश्यकता नहीं। लेखनी स्वयं ही चल पड़ती है जब भावनाएं अपनी उड़ान पे निकलती हैं। हाँ हिंदी भाषा , साहित्य और साहित्यकारों की स्थिति देख कष्ट अवश्य होता है। अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में हिंदी बस एक विषय बन कर रह गया है और महादेवी जी, दिनकर जी, निराला जी बस जैसे तैसे समझ कर परीक्षा उत्तीर्ण करने का साधन मात्र। उसके बाद उनका साहित्य समझने या पढ़ने की किसी को चाह नहीं।

फोकस24 :- आपके पसंदीदा कवि, साहित्यकार या प्रेरणास्रोत?

स्वधा :- मेरे पसंदीदा कवि दिनकर, पंत ,निराला, महादेवी जी है। आज के कवियों की बात करूँ तो गोपाल दास नीरज जी, ब्रजेन्द्र अवस्थी जी, अशोक चक्रधर जी प्रेरणास्रोत भी हैं और पसंदीदा कवि भी।

फोकस24 :- आप नवोदित साहित्यकारों को और नव पीढी, समाज  को क्या संदेश  व क्या सुझाव देना चाहेंगी ?

स्वधा :- मेरा अनुरोध तो साहित्यकारों से यही है कि अच्छा लिखें और सार्थक लिखें जिससे साहित्य का विकास हो सके। लेखनी में बहुत ताकत है और अच्छा साहित्य समाज की दिशा परिवर्तित कर सकता है।

फोकस24 :- आपकी सबसे अच्छी रचना कौनसी है ?साहित्यकार की उपलब्धि सम्मान तक ही सीमित तो नही हो रही वर्तमान के दौर मे? 

स्वधा:- अपनी रचनाओं में से किसी एक रचना का आंकलन के उसे अच्छा कहना तो संभव नहीं। पर हाँ कभी कुछ पँक्तियाँ लिखी थी जो यदा कदा गुनगुना उठती हूँ-

मैं पंछी बन उड़ जाऊँगा

चिर निद्रा में सो जाऊँगा 

तुम मुझको अपना लो वरना

मैं दूर चला जाऊँगा

मैं पंछी बन उड़ जाऊँगा।

क्रंदन होगा सृंगार नहीं होगा मन में 

यदि मुझको कलरव का न तेरे गान मिला

मुझको दे दे ये दान नहीं तो जीवन का 

हर गान अधर पर ला कर मैं बतलाऊंगा

मैं पंछी बन उड़ जाऊँगा।

अनुभव की चक्की से जीवन को मत पीसो

बस वही करो जो ह्रदय तुम्हारा कहता है

एक ऐसा पल अन्यथा आएगा जीवन में 

जब अम्बर पर मैं ध्रुव बन कर तड़पाऊंगा

मैं पंछी बन उड़ जाऊँगा।

जहाँ तक रही आपके इस प्रश्न के उत्तर की बात कि साहित्यकार की उपलब्धि सम्मान तक ही सीमित तो नही हो रही वर्तमान के दौर मे? तो यही कहना चाहूंगी कि किसी भी सहित्यकार की रचनाओं का वास्तविक सम्मान यह है कि वो किसी और के होंठों पर सज जाएं। परंतु आज के दौर में सम्मान देना और लेना जैसे आम सी बात हो गयी है। लेखन के क्षेत्र में बिना कुछ किये लोग जाने कितने सम्मान लिए बैठे हैं।

फोकस24:- साहित्य समाज का दर्पण होता है? वर्तमान में साहित्य के विकास के लिए क्या कार्यनीति निर्धारित होनी चाहिए? 

स्वधा :-  बिल्कुल साहित्य समाज का दर्पण होता है। सूर , कबीर , तुलसी की रचनाएं तत्कालीन समाज की वास्तविक स्थिति दिखाती है। स्वतंत्रता आंदोलन के समय लिखा गया साहित्य तत्कालीन सामाजिक स्थितियों का पूर्ण परिचय देता है। जैसी समाज की स्थिति होती है वैसा ही साहित्य सृजन होता है।

वर्तमान में साहित्य के विकास के लिए हिंदी भाषा के प्रयोग को बढ़ाने पर विशेष ध्यान देना होगा। और यह कार्य विद्यालय स्तर पर प्रारंभ करना होगा। बच्चों में हिंदी के प्रति रुचि उत्पन्न करनी होगी। उन्हें सूर ,कबीर ,तुलसी, दिनकर, पंत, निराला जी की लेखन शैली से परिचित करवाना होगा। इसके अतिरिक्त भाषा विकास हेतु विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन कर , बच्चों में साहित्य के प्रति रुझान जगाना होगा। आज यदि हम अपने नवांकुरों को तैयार कर सके तो निश्चय ही आगे आने वाले समय मे साहित्य का एक नवीन रूप देखने मिलेगा।

एक नजर इनकी पर्सनल डिटेल्स पर

नाम :- स्वधा रवींद्र "उत्कर्षिता"

पति:- श्री रवींद्र कुमार अमात्य

पता:- 5/937, विराम खंड, गोमती नगर, लखनऊ, 226010

व्यावसायिक परिचय: वास्तुविद(आर्किटेक्ट), शिक्षक

कार्यरत:- स्टडी हॉल स्कूल।

शिक्षा :  एम.एड, बी.एड,

            एम.ए राजनीति शास्त्र ,

            एम. ए समाज शास्त्र, 

            एम. ए इतिहास, 

            एम.ए शिक्षा शास्त्र

            डिप्लोमा वास्तुविद

            संगीत विशारद प्रयाग संगीत समिति

            संगीत निपुण भातखंडे संगीत महा विद्यालय।

विधाएं:- गीत, गज़ल, दोहे, मुक्तक, छंद, लयबद्ध 

             कविताएं, छंदमुक्त कविताएं, लघु कथाएं, 

             कहानियां,संस्मरण।

प्रकाशित कृतियाँ :- कल्पवृक्ष एकल काव्य संग्रह

                           कथांजली साझा लघुकथा संग्रह

                           काव्यांजलि साझा, काव्य संग्रह

                           कारवाँ साझा लघु कथा संग्रह

सम्मान:- आदिशक्ति ब्रिगेड की उत्तरप्रदेश की अध्यक्ष,

             महादेवी वर्मा सम्मान ।

             कवितालोक द्वारा गीतिका गौरव सम्मान 

             सारथी मिशन ट्रस्ट द्वारा सी वी रमन शांति

             पुरुस्कार।

             गुफ़्तगू पब्लिकेशन द्वारा सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान।

साहित्यिक परिचय

वो ताजमहल हूँ मैं जो

पत्थर का नही है

जिसमे है बहता रक्त लाल 

श्वेत नही है

चाहो तो कहीं से भी हमे

तोड़ के देखो

दिल ही मिलेगा साथ मे

पाषाण नहीं है।