हिंदी दिवस स्पेशल : हिंदी की अड़चनें सियासी अधिक

Slider 1
« »
14th September, 2018, Edited by Admin

इलाहाबाद सिटी। आज हिंदी दिवस है। देश भर में हिंदी दिवस मनाया जा रहा है। बल्कि यह कहें कि भुनाया जा रहा है तो अतिशयोक्ति न होगी। सचमुच बड़ी कोफ्त होती है जब अधिकारी वर्ग कहता है कि आज हिंदी डे है और काफी तैयारी करनी है हिंदी डे सेलेब्रेट करने के लिए। देश के बाहर मलेशिया, सिंगापुर,  जावा, सुमात्रा और बाली में अंतरराष्ट्रीय हिंदी मंच स्थापित किये जाते हैं। विचार करने वाली बात है कि हम क्यों अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति इतने उदासीन हैं। भाषा और संस्कृति किसी देश की पहचान होती है पर हमारे देश में सारी खूबियाँ राजनीतिक बुल्डोजर से रौंद दी जाती हैं। एक लेखक होने के नाते मैं सोचता हूँ कि देश हित की बात सबको मिल-बैठकर सोचनी चाहिए।

आत्मविश्वास के लिए देश की एक भाषा अनिवार्य

हमारे देश की बनावट व स्वरूप कुछ ऐसा है कि यहाँ अनेक भाषाएँ-उपभाषाएँ हैं। ऐसी दशा में देश के लिए एक वाणी अनिवार्य है। वह सर्वस्वीकार्य भी होनी चाहिए। इससे देश और देशवासियों में एक अलौकिक आत्मसुख का अनुभव और आत्मविश्वास पैदा होगा। मैं बेझिझक रूप से कह सकता हूँ कि देश को भाषाई रूप से आत्मविश्वासी बनाने में भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी और पूर्व रक्षा मंत्री श्री मुलायम सिंह यादव का योगदान अविस्मरणीय है। जहाँ वाजपेयी जी ने संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी का बिगुल बजाया, वहीं आदरणीय मुलायम सिंह यादव जी ने इलाहाबाद में भारतीय भाषा केन्द्र के माध्यम से भारतीय भाषाओं के प्रति अपनी निष्ठा दिखायी।

तमाम विरोधों के बावजूद समृद्ध हुई हिंदी

राजनीतिक वितंडावाद की वजह से दक्षिण भारत में जहाँ हिंदी का विरोध होता है, वहीं वहाँ की हिंदी बड़ी सशक्त और प्रभावशाली है। राजनीतिक बेबसी चाहे जो हो पर व्यावहारिक रूप से तमाम विरोधों के बावजूद आज हिंदी जितनी समृद्ध हुई है, यह गर्व की बात है। यदि हिंदी को पूर्ण रूप से रोजगारपरक बना दिया जाय तो शायद बड़ा कल्याण हो जाये। सितम्बर का महीना ही हिंदी महीना न रहे, पूरा वर्ष पूरा देश हिंदी में बात करे तो शायद बढ़िया हो। संस्कृत की पुत्री हिंदी वैसे तो किसी की मोहताज नहीं है, फिर भी एक अदद ईमानदारी की जरूरत है। दूर करने होंगे राजनीतिक और क्षेत्रीय अड़चन के रोड़े।

इनपुट : राकेश मालवीय, इलाहाबाद सिटी।