पढ़े रोचक कहानी : बेपेंदी का लोटा

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12th April, 2019, Edited by Renu mishra

फीचर्स डेस्क। सुबह सुबह मालकिन ने, काफी पहले रसोई से तिरस्कृत हो चुके पुराने बर्तनों के ढेर से, एक गोल पेंदी वाला डेढ़ किलो वजन का फूल का लोटा निकाला। कामवाली बाई को देते हुए बोली कि इस लोटे को आज साफसाफ मांज कर चमका देना। तुलसी मैय्या पर पानी चढ़ाने के काम आएगा। स्टील के लोटे के समकक्ष वजन वाला समझकर बाई ने उस लोटे को पकड़ा ही था कि वह लोटा अपने वजन के कारण उसके हाथ से छूट गया और घन्नघन्न की आवाज के साथ जमीन पर गिर कर लुढ़क गया।

मालकिन की कर्कश आवाज वाली डांट पाकर बाई ने अबकी बार उस लोटे को मजबूती से पकड़ा और गोल गोल घुमाकर, मांजकर खूब चमका डाला। उस चमकदार लोटे को बहुत सम्भालकर एक मेज पर रख दिया गया कि कहीं लुढ़ककर फिर से जमीन पर न गिर पड़े। मेज पर बैठे बैठे उस लोटे ने अपनी जिंदगी का वह दिन याद किया जब वह मालकिन की शादी में पैर धोवाई में प्रयोग हुआ था और पूरी इज्जत के साथ अन्य बड़े बड़े बर्तनों के साथ मालकिन की ससुराल आया था। घरवालों ने कितने प्यार से उसके गोल पेट को सहलाकर कहा था कि यह गोली पर का लोटा बहुत वजनदार और सुंदर है। काफी दिनों तक मालिक उसे अपने लिए पानी भरकर शौच के लिए साथ ले जाते रहे। किस्मत भी कितनी दुष्ट होती है।

गांव के घर से शहर की ओर यात्रा हुई। मालिक के हाथों में अब वह तो था नहीं बल्कि उसकी जगह एक बदसूरत सा मग्गा लग गया था। शौच में अब वही मग्गा मालिक का मददगार और दुलारा हुआ करता था। न ससुरा कभी नहाता था न ही कभी धोया जाता था। तभी उस गोल पेंदी के लोटे के कान में मलिक की आवाज पड़ी कि वह रामलखना नेता, ससुरा बेपेंदी का लोटा निकला। पिछले चार सालों में पांच बार दल बदल चुका है। इस बार फिर दल बदल कर दलबदलू पार्टी में आ गया। बेपेंदी का लोटा शब्द सुनते ही इस लोटे के दिल में आग लग गयी। सोचा जब बिना पेंदी का घड़ा, दाल पकाने वाली बटुई, बड़ा वाला बटुआ, देग आदि तमाम तरह के बर्तन मौजूद हैं तो बिना पेंदी वाले बेचारे लोटे को ही क्यों तिरस्कृत किया जाता है। इसमे उसकी क्या गलती। बनाने वाले ने अगर पेंदी में एक मोटा से छल्ला लगा दिया होता तो वह ऐसी तोहमत से बच सकता था। तभी मालकिन आईं और लापरवाही के साथ, रोज की ही तरह स्टील का गिलास समझ उस वजनी लोटे को उठा लिया। किन्तु वजनी होने के कारण वह लोटा उनके हाथ से छूटा और पैर पर धच्च से गिर पड़ा। डेढ़ किलो का वजन पैर पर गिरते ही मालकिन की चीख निकल गयी। हाय हाय मर गयी कहती हुई कुर्सी पर बैठ गईं।

मालिक दौड़ कर आये और मलहम लगाया। जब कुछ दर्द कम हुआ तो मालकिन बोली कि इस कमबख्त बेपेंदी के लोटे को बेचकर कोई अच्छा सा हल्का टिकाऊ और पेंदी वाला स्टील का लोटा बाजार से ले आना। मालकिन के आदेश का पालन हुआ और शाम को ही मालिक उस लोटे को लेकर बर्तन की दुकान पर पहुंच गए। उस लोटे को देखते ही दुकानदार ने कहा कि चलन से बाहर हो चुके ऐसे बेपेंदी के लोटे अब बहुत कम नजर आते हैं। हालांकि, इनकी कमी बिल्कुल महसूस नहीं होती क्योंकि इनकी जगह आज नेतारूपी आदमी ने ले ली है। बेपेंदी के लोटे जैसे नेताओं की वक़त आज बहुत ज्यादा बढ़ चुकी है। सरकार बनाओ और गिराओ में इनका बहुत जबरदस्त योगदान होता है। ऐसी बड़ाई सुनकर बेपेंदी के लोटे का सीना गर्व से फूल गया और आदमी की ही तरह बिककर वह शान से अपनी अगली यात्रा पर निकल पड़ा। जय हो बेपेंदी के लोटों की।

कंटेंट सोर्स : आर. के. शुक्ला के फेसबुक वाल से....