कश्मीरी आईडेंटिटी......................

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11th August, 2019, Edited by manish shukla

अताह तापस चतुर्वेदी

एक था बुरहान वानी, जो अचानक आतंकवादी हो गया। हिज्बुल मुजाहिद्दीन ( कश्मीर में सक्रिय सबसे खतरनाक अलगाववादी आतंकी संगठन) का कमांडर बन गया। देखते-देखते भटके हुए कश्मीरी यूथ का हीरो हो गया। उसके बहकावे पर बहुत से युवा तुर्क “हमें चाहिए आजादी” का नारा लगाते हुए उसकी राह पर चल पड़े। एक दिन आर्मी ने बुरहान का एनकाउंटर कर दिया। बुरहान की मौत के नाम पर अलगाववादियों ने परोक्ष-अपरोक्ष रूप से जमकर आतंक बोया, धारा 370 के हटने का आज विरोध करनेवाले तब शायद जिसे शांति बहाली के रूप में देख रहे थे। बुरहान की मौत के बाद की दहशतगर्दी पर कश्मीरी आईडेंटिटी को लेकर सवाल नहीं उठे थे!                  अलगाववादियों ने बुरहान को शहीद का दर्जा दिया गया। उसे कश्मीर का शहीदे आजम भगत सिंह कहा गया। कई मस्जिदों के लाउड स्पीकर उसके रिकार्डेड संदेशों से गूंजने लगे। किसी धारा 370 समर्थक ने जहमत नहीं उठाई उन मस्जिदों में जाकर कहने की- “ गलत कर रहे हो, ऐसे तो तुम्हारी आईडेंटिटी बिगड़ जाएगी, अल्लाह की राह दहशतगर्दी की मंजिल पर नहीं ले जाती”।

          वामपंथी विचारकों को मस्जिदों से गूंजती बुरहान वानी की आवाज में शांति नजर आई। कश्मीरी आईडेंटिटी दिखी। साल 1990 में भी यही हुआ था। अलगाववादियों के लिए महिलाएं प्रेरणा गीत गातीं थीं। लाउड स्पीकर्स से पाकिस्तान जिंदाबाद की आवाजें गरजती थीं...जीवे..जीवे पाकिस्तान.. का गीत जुबां पर रहता। याद है क्या हुआ था साल 1990 में? कश्मीर से हिंदुओं-पंडितों को घर छोड़कर चले जाने या मर जाने का आदेश दिया गया था। पाकिस्तान की पैरवी करती कश्मीरी आईडेंटिटी की खातिर! वरिष्ठ पत्रकार अपूर्वानंद और सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर दिल्ली में ढोल-ढपली के साथ धारा 370 निरस्त किए जाने के खिलाफ चंद वामपंथी अधेड़ों और छात्रों के साथ प्रदर्शन करते हुए कहते हैं कि यह मानव अधिकारों का हनन है। उनसे सवाल होना चाहिए कि साल 1990 में जो हुआ वो क्या था?

     अब वो कहेंगे कल की नहीं आज की बात कीजिए.. ठीक है वर्तमान में रहते हैं...पुलवामा अटैक ज्यादा पुराना नहीं है, एक तरह से वर्तमान है, धारा 370 लागू थी। उस हमले में जिसमें 45 से ज्यादा जवान शहीद हुए, वो क्या धारा 370 के तहत अलगाववादियों और पाकिस्तान की संयुक्त शांति प्रक्रिया का हिस्सा था? क्या यह हमला कश्मीरी आईडेंटिटी बचाने के लिए हुआ था? दिल्ली में प्रदर्शन कर रहा महंगे कपड़े पहनकर आया एक कश्मीर स्टूडेंट कह रहा था “यह हमारी आईडेंटिटी पर खतरा है”। गौर कीजिए कि वह प्रदर्शन कहां कर रहा था दिल्ली में, और क्या कह रहा था “हमारी आईडेंटिटी पर खतरा है”। भारत की राजधानी में आकर सारी सहूलियतें हासिल करने पर भी उसे अपनी कश्मीरी आईडेंटिटी पर खतरा नजर आता है? “आईडेंटिटी पर खतरा” यानी कश्मीरी भारतीय नहीं हो सकते! इसी तरह धारा 370 हटाए जाने को अपराध बताती एक पोस्ट में लिखा है “ कश्मीरी पंडित यानी हर अपराध की ढाल”। कश्मीरी पंडितों के नरसंहार पर लेखन ने इस तरह ताना मारा है- “एक ही सवाल- जब पंडितों को घाटी से निकाला जा रहा था तो आप कहां थे? अब मैं तो पलटकर पूछ लेता हूं कि भाई मैं तो देवरिया में था आप कहां थे!” यह व्यक्ति कितना संकीर्ण है सोचिए! इसके लिखे से लगता है कि 1990 का नरसंहार हास्य का विषय है क्योंकि ये साहब देवरिया में थे।

     एक धारा हटा देना अपूर्वानंदों, हर्ष मंदरों और ऐसे स्वार्थी-निर्लज्ज लेखकों को मानव अधिकारों का हनन लगता है। कश्मीरवासियों की आईडेंटिटी पर खतरा लगता है। कहते हैं बुरहान वानी के जनाजे में डेढ़ लाख लोग शामिल थे। आर्मी ने किसी एक पर भी गोली नहीं चलाई। वैसे आतंकियों के जनाजे बड़े धूम से निकलते हैं, भारत पर अपशब्द उगलते हुए, गोलियों चलाकर मानव अधिकारों की रक्षा करते हुए, कश्मीरी आईडेंटिटी बचाते हुए। आर्मी के जवान उन्हें दूर से देखते खड़े रहते हैं क्योंकि उन्हें इन जनाजों पर कार्रवाई न करने का आदेश है। धारा 370 दहशतगर्दों के काम की है, क्योंकि यही उनकी आईडेंटिटी है। कश्मीर की एक आईडेंटिटी यह भी है कि वहां के जवान 500 रुपए में हमारे जवानों पर पत्थर फेंकने को राजी हो जाते हैं। कल को कश्मीर की तरह पंजाब के लोग खालिस्तानी होने को अपनी आईडेंटिटी बताकर धारा 370 जैसा कोई विकल्प मांगने लगे तब? बिहार कहे कि हमारी आईडेंटिटी पर खतरा है, हमारा अलग संविधान बनाएंगे फिर?