अहंकार शहद के समान होता है : निकीता

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7th March, 2019, Edited by Pratima Jaiswal

फीचर्स डेस्क। अहंकार जीव को जीवन में कभी आगे बढ़ने नहीं देता। अहंकार को दो प्रकार का बताया गया है। पहला वास्तविक अहंकार और दूसरा मिथ्या अहंकार। आपको बता दें कि मिथ्या अहंकार, मधु अर्थात शहद के समान होता है। शहद के दो गुण होते हैं। जिसमे पहला गुण  शहद बहुत मधुर होता है और दूसरा गुण जो बहुत लोग नहीं जानते होंगे वो यह है कि शहद को अधिक मात्रा में लेने से जीव मादक अर्थात नशे में चूर हो जाता है। इसी प्रकार मिथ्या अहंकार को भी मधु के समान बताया गया है। क्योंकि सभी झूठी धारणाएं जो हम अपने लिए सोचते हैं कि मैं बहुत महान हूं, मुझ जैसा कोई नहीं तो यहाँ शहद का पहला गुण कार्य करता है, क्योंकि हमें यह बहुत प्यारा अर्थात मधुर लगता है।

हम इस तथ्य को अस्वीकार कर सकते हैं लेकिन वास्तव में तो हमें यह बहुत मधुर लगता है और कई लोग हमारी उस झूठी धारणा को आप बहुत महान हो, आप अद्भुत हो, यह कहते हुए मजबूत करते हैं और हम दूसरों के मुख से भी यह सुन लेते हैं कि हम कितने महान हैं और जब बहुत सारे लोग एक ही बात बार-बार बोल रहे हों अर्थात हमारी प्रशंसा कर रहे हैं तो हम यह सोचने लगते हैं कि इतने सारे लोग बोल रहे हैं इसका अर्थ है कि इन सबको मेरे विषय में अच्छे से पता है और मैं सचमुच बहुत महान हूँ। तब यहाँ शहद का दूसरा गुण कार्य करता है और हम प्रशंसा के नशे में मदमत्त हो जाते हैं। 

ब्रह्मवैवर्तपुराण में कहा गया है कि

मधु क्लीबं च माध्वीके कृतकर्मशुभाशुभे ।

भक्तानां कर्मणां चैव सूदनं मधुसूदनः ।।

मधुसूदन का अर्थ है जो विशेष रूप से हमारे मिथ्या अहंकार को नष्ट करे। श्री कृष्ण हमारे इस मधु रूपी मिथ्या अहंकार को नष्ट करने में सहायता करते हैं, इसलिए उनके नाम मधुसूदन का एक अर्थ यह है जो हमारे मधु रूपी मिथ्या अहंकार के मद को नष्ट करे।

श्री कृष्ण अनेक प्रकार से हमारे इस मिथ्या अहंकार को नष्ट करते हैं उनमे से मुख्य दो प्रकार हैं। पहला श्री कृष्ण भगवद गीता तथा वैदिक ग्रंथों में बताये गए अपने उपदेशों के माध्यम से हमारे इस अहंकार को नष्ट करते हैं और दूसरा श्री कृष्ण अपने अनेक प्रकार की लीलाएं जैसे गोवर्धन धारण लीला, दावाग्नि लीला आदि से हमारे मद को नष्ट करते हैं और हम इन लीलाओं को देखकर समझ सकते हैं कि हमसे भी महान कृष्ण हैं क्योंकि जो कार्य कृष्ण कर सकते हैं वो हम नहीं कर सकते। और जब इस प्रकार की विचारधरा हमारे अंदर आती है तब हम मिथ्या अहंकार को दूर कर अपने वास्तविक अहंकार में स्थित होकर स्वयं को भगवान के दास के रूप में स्वीकार कर लेते हैं।

कंटेंट सोर्स : निकीता सती, उतराखंड।