मृगनयनी

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15th April, 2019, Edited by Focus24 team

फीचर्स डेस्क। "सांझ आई आंधी अब तनिक थम गई है। "रामवती चल आज तो अलाव के लिए आम अमरूद की बगिया में ढेर सारी लकडियाँ मिल जयेगी " मजा आ जयेगा अमरूद भी मिलेगे " कहीं हमसे पहले वो मेहमान लड़का न पहुँच जाए

रामवती किसकी बात कर रही हो ?

अरे वही गायञी की मामी का बेटा जो शहर से छुट्टी बिताने आया है।

अच्छा वो जो गाँवकी हर चीज दीदे फाड़-फाड़ कर देखता फिरता है।

हम लोग भोले के मंदिर से जल चडा़ के आ रही थी तो तुझे केसे ताड़रहा था।

"अरे चल हट कुछ भी बोलती रहती है।"

*रामवती का चेहरा सुर्ख लाल हो गया"

भई ऐसे क्या सुरखाब के पर लगे है जो सब अपना काम छोड़ कर हमी को ताड़ते रहेगे।" "रामवती तुम्हारा से सोने सा दमकता रंग बड़ी - बड़ी बोलती आँखे लम्बे बाल हर कोई तुम्हरी एक झलक पाना चाहता है।"

गाँव की नयी नवेली बहुए भी तुम्हें देख कर कुड़ जाती है 

"काश हम भी ऐसे होते"

"तभी तो वो लड़का ईश्ssssचुप बेकार की बाते मत करो"

*अब शाम गहरा गई है चल तू फल बटोर मैं लकड़ी  चुन लेती हूँ और बिटोरे से कंडे भी लेने है।

लकडी़ इकठ्ठी कर बिटोरे जेसे ही कंडे निकालने लगी "एक हाथ तेजी से बढा़ और हथेली पर कागज रख जब तक कुछ समझ पाती   साये की तरह गायब हो गया।

हथेली पर सुखद अनुभूती का ऐहसास पहली बार हुआ "।

मुड़े हुए कागज को में  हाथ भीच कर बसंती के साथ घर आ गई।

रामवती बेटा आ गई बेहद ठंड है लकड़ी से अलाव जलादो और हाथ मुँह धो कर खना खलो  जी माँ। "अलाव को जला कर उसके पास घुटनों में सिर रख 

आज अलाव की रोशनी में हथेली खोलकर कागज की सिलवटे खोली तो देखा उस पर लिखा था मृगनयनी मैं कल जा रहा हूँ मेरी छुट्टी खतम हो गई है। अगली छुट्टी तक विदा 

"तुम्हारा शहरी पंकज"

रामवती कभी हथेली को बार -बार छू कर देखती है।कभी उस पर रखे कागज के टुकड़े को। पता नहीं अब कब मुलाकात होगी .......... या नहीं भी पर इंतजार तो मुझे भी रहेगा एक अंजाने से एहसास से दिल सराबोर हो गया क्या यही प्यार है।

कंटेंट सोर्स : अर्विना गहलोत, प्रयागराज सिटी।