कुलच्छिनी 

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13th June, 2019, Edited by manish shukla

फीचर्स डेस्क। इस चारदीवारी में वह दोनों ही थी। पहली ने दूसरी से पूछा, "कहो, कैसे आ पहुँची?" दूसरी ने संशय से पहली को देखा और एक कोने में संकुचित हो दीवार से पीठ सटा कर बैठ गई। सिर घुटनों में फँसा था और दोनों हाथ कानों पर! अलसुबह सूर्य की सुनहरी किरणों के धरा को उजियारा करने से पूर्व ही वह उठ जाती। पशुओं की सानी बनाती। चौक-आँगन लीपती। पूजा अर्चना कर रसोई में पहुँच जाती। बदरंग से टेढ़े-मेढ़े डिब्बों में जाने कब-कब का क्या-क्या सामान रखा था। सामने दीवार पर जगदम्बा का एक बड़ा कैलेंडर कई सालों से टँगा था। हवा और भाग्य मानो दोनों ही उससे रूठे थे। चौमासे की घुटन और मच्छर... पूरे दिन जी मिचलाता रहता!

"आज सोमवार है, लेकिन भोलेनाथ पर जल न चढ़ाते बना तोहे से!", सासू माँ ने अपने चिरपरिचित स्वर में बडबडाते हुए उलाहना दिया।

"चढ़ा रही थी, लेकिन...", उसकी बात अधूरी ही रह जाती, क्योंकि बूढी सास सुनना ही नहीं चाहती थी।

"चाय जरा भिन्सारे बना दिया कर... और सुन, इतनी शक्कर डालेगी? क्या मायके से भंडार भरा है?",फिर भिनभिनाई वृद्धा।

"वो मच्छर...", फिर बहू ने बात संभालनी चाही।

"कुचैया इतेक मोटी चबाते न बनती", सास बोली, पर इतने से काम न चला तो बात बढाते हुए बोली,  "ऐ सिव संकर बहुरिया को समझाए लो। मुँह उघाड़े गाँव भर में घूमे है।"

"तू काहे न सुनती माँ की बात। रहना है कि मायके जाना है... बोल", पति भी उसी पर चिल्लाता, बिना यह जाने कि गलती किसकी है

"जी, मच्छर की आवाज से सिर दुखने लगता। सब कारज बिगड़ जाते", डरते-डरते उसने कह ही दिया।

"कोई राजमहल से आई हो का। जाओ तेल ला सिर मल दो तनिक", पति ने धमकाया और बोला, "आज अस्पताल भी चलना होगा तनिक तेजी से काम निबटा लियो।ढुलमुल-ढुलमुल न कीजो"

"क्यों?", उसे थोड़ा विस्मय हुआ।

"आशा दाई आई थी। कह रही थी खून नहीं है बहुरिया में। चढ़वाना पड़े। बच्चे को भी खतरा", बात समझाई गई।

"सब खून तो मच्छर पी जाते", वह होठों में बुदबुदाई और सिसकने लगी।

वह गुस्से में तेल की शीशी फेंक खड़ा हो गया। बोला, "क्या मच्छर-मच्छर बोलती रहती। दो हाथों के बीच यूँ मसल दे कर मच्छर... बात करती है!", अंगोछा कंधे पर डाल वह बाहर निकल गया। उसका रुदन और तीव्र हो गया। पिछले अजन्मे दो बालकों की टीस भी उभर आई।

"काहे गला फाड़ रही है री अपसगुनी। जा कपड़े धो जल्दी, फिर खाना भी बनाना", यह सासू माँ का हुक्म था।

उसने सजल नेत्रों से देखा और सोचा आखिर कब तक मच्छर यूँ ही भिनभिना कर उसका खून चूसते रहेंगे। वह शिवशंकर सही कहता है... मसल दो। आज वह तय करके उठी और दोनों हाथों के बीच गर्दन को लेकर मसल दिया।

बुढापे का शरीर घूँ- घूँ करता ढह गया।

तभी शिवशंकर कोठरी में वापिस लौटा। 

"कुलच्छिनी!!", वह दहाड़ा,  "मेरी माँ को खा गई।" बेदम माँ को वही छोड़ आवेशवश बालों से घसीटकर उसे थाने ले गया। घूँघट क्या साड़ी भी रास्ते भर फिसलती गई।

"ऐसे काहे रो रई। कोहू का खून करी हो का?" पहली की आवाज से दूसरी वर्तमान में लौटी और सिर उठाया, "तुम्हीं बोलो ....मच्छर मारने की सजा उम्रकैद ... कहाँ का इंसाफ है भला?" 

वह पुनः घुटनों  में सिर फँसा फूट-फूट कर रो रही थी। साथ वाली स्त्री विस्फारित नेत्रों से टुकुर-टुकुर उसे देखे जा रही थी।

कंटेंट सोर्स : निधि अग्रवाल, लखनऊ सिटी।